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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 356
१६ अक्टूबर, १८८३परिच्छेद ५७३३३

“जैसे चैतन्यदेव; प्रेम से हँसते हैं, रोते हैं, नाचते हैं, गाते हैं। चैतन्यदेव अवतार हैं - उनके रूप में ईश्वर अवतीर्ण हुए हैं।

श्रीरामकृष्ण गाना गा रहे हैं -

(भावार्थ) - “भावनिधि श्रीगौरांग का भाव तो होगा ही रे' वे भावविभोर होकर हँसते हैं, रोते हैं, नाचते हैं, गाते हैं' सिसक-सिसककर रोते हैं।”

(३)

चित्तशुद्धि के बाद ईश्वरदर्शन

बलराम के पिता, मणि मल्लिक, वेणी पाल आदि बिदा ले रहे हैं।

सायंकाल के बाद कंसारीपाड़ा की हरिसभा के भक्तगण आए हैं। उनके साथ श्रीरामकृष्ण मतवाले हाथी की तरह नृत्य कर रहे हैं। नृत्य के बाद भावविभोर होकर कह रहे हैं, “मैं कुछ दूर अपने आप ही जाऊँगा।”

किशोरी भावावस्था में चरणसेवा करने जा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण ने किसी को छूने नहीं दिया।

सन्ध्या के बाद ईशान आए हैं। श्रीरामकृष्ण बैठे हैं - भावविभोर। थोड़ी देर बाद ईशान के साथ बात कर रहे हैं, ईशान की इच्छा है, गायत्री का पुरश्चरण करेंगे।

श्रीरामकृष्ण (ईशान के प्रति) - तुम्हारे मन में जो है, वैसा ही करो, मन में और सन्देह तो नहीं रहा?

ईशान - मैंने एक प्रकार प्रायश्चित्त की तरह संकल्प किया था।

श्रीरामकृष्ण - इस पथ में (तन्त्रमार्ग में) क्या यह नहीं होता? जो ब्रह्म है, वही शक्ति काली है। 'काली ही ब्रह्म है यह मर्म जानकर मैंने धर्माधर्म सब छोड़ दिया है।'

ईशान - चण्डी-स्तोत्र में है, ब्रह्म ही आद्याशक्ति हैं। ब्रह्म और शक्ति अभिन्न हैं।

श्रीरामकृष्ण - यह मुँह से कहने से ही नहीं होगा। जब धारणा होगी तब ठीक होगा।

“साधना के बाद चित्तशुद्धि होने पर यथार्थ ज्ञान होगा कि वे ही कर्ता हैं। वे ही मन-प्राण-बुद्धिरूप हैं। मैं केवल यन्त्ररूप हूँ' 'तुम कीचड़ में हाथी को फँसा देते हो, लंगड़े से पहाड़ लँघवाते हो!'

“चित्तशुद्धि होने पर समझ में आएगा, पुरश्चरण आदि कर्म वे ही करवाते हैं। 'उनका काम वे ही करते हैं; लोग कहते हैं, मैं करता हूँ।'

“उनके दर्शन होने पर सभी सन्देह मिट जाते हैं। उस समय अनुकूल हवा बहती है। अनुकूल हवा बहने पर जिस प्रकार नाव का माँझी पाल उठाकर पतवार पकड़कर बैठा रहता है और तम्बाकू पीता है, उसी प्रकार भक्त निश्चिन्त हो जाता है।”