भारतकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

पृष्ठ 347, कुल 711 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 347
३२४श्रीरामकृष्णवचनामृत१० अक्टूबर, १८८३

(भावार्थ) - “मैंने अभय पद में प्राणों को सौंप दिया है” इत्यादि।

श्री सारदाबाबू पुत्रशोक से अत्यन्त व्यथित हैं। इसलिए उनके मित्र अधर उन्हें श्रीरामकृष्ण के पास लाये हैं। वे गौरांग के भक्त हैं। उन्हें देखकर श्रीरामकृष्ण में श्रीगौरांग का उद्दीपन हुआ है। श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं -

(भावार्थ) - “मेरा अंग क्यों गौर हुआ?” इत्यादि।

अब श्रीगौरांग के भाव में आविष्ट हो गाना गा रहे हैं। कह रहे हैं, सारदाबाबू यह गाना बहुत चाहते हैं।

(भावार्थ) - “भावनिधि गौरांग का भाव होगा नहीं तो क्या? भाव में हँसते हैं, रोते हैं, नाचते हैं, गाते हैं। वन देखकर वृन्दावन समझते हैं। गंगा देख उसे यमुना मान लेते हैं। गौरांग सिसक-सिसककर रो रहे हैं। यद्यपि वे बाहर ‘गोर’ हैं तथापि भीतर वे ‘कृष्ण’ हैं।

(भावार्थ) - “माँ! पड़ोसी लोग हल्ला मचाते हैं। मुझे गौरकलंकिनी कहते हैं? क्या यह कहने की बात है? कहाँ कहूँगी? ओ प्यारी सखि, लज्जा से मरी जाती हूँ। एक दिन श्रीवास के मकान में कीर्तन की धूम मची हुई थी; गौररूपी चन्द्रमा श्रीवास के आँगन पर लोटपोट हो रहा था। मैं एक कोने में खड़ी थी। एक ओर छिपी हुई थी। मैं बेहोश हो गयी। श्रीवास की धर्मपत्नी मुझे होश में लायी। एक दिन गौर नगरकीर्तन कर रहे थे; चाण्डाल, यवन आदि भी गौर के साथ थे। वे ‘हरि बोल’ ‘हरि बोल’ कहते हुए नदिया के बाजारों में से चले जा रहे थे। मैंने उनके साथ जाकर दो रक्तिम चरणों के दर्शन किए थे। एक दिन गंगातट पर घाट पर गौरांग प्रभु खड़े थे। मानो चन्द्र और सूर्य दोनों ही गौर के अंग में प्रकट हुए थे। गौर के रूप को देखकर शाक्त और शैव भूल गए। एकाएक मेरा घड़ा गिर पड़ा! दुष्ट ननदिया ने देख लिया था।”

बलराम के पिता वैष्णव हैं; सम्भव है इसीलिए अब श्रीरामकृष्ण गोपियों के दिव्य प्रेम का गाना गा रहे हैं।

(भावार्थ) - “सखि! श्याम को पा न सकी, तो फिर किस सुख से घर पर रहूँ? यदि श्याम मेरे सिर के केश होते तो हे सखि, मैं उसमें बकुल फूल पिरोकर यत्न के साथ वेणी बाँध लेती। श्याम यदि मेरे हाथ के कंगन होते, तो सदा बाँहों में लगे रहते। सखि, मैं कंगन हिलाकर, बाँह हिलाकर चली जाती। हे सखि! मैं श्यामरूपी कंगन को हाथ में पहनकर सड़कों पर से चली जाती। जिस समय श्याम अपनी बाँसुरी बजाता है, तो मैं यमुना में जल लेने आती हूँ। मैं भटकी हुई हरिणी की तरह इधर-उधर ताकती रहती हूँ।”

(२)

सर्वधर्म-समन्वय और श्रीरामकृष्ण

बलराम के पिता की उड़ीसा प्रान्त में भद्रक आदि कई स्थानों में जमींदारी है और