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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 348
१० अक्टूबर, १८८३परिच्छेद ५६३२५

वृन्दावन, पुरी, भद्रक आदि अनेक स्थानों में उनकी देवसेवा और अतिथिशालाएँ भी हैं। वे वृद्धावस्था में श्रीवृन्दावन में भगवान् श्यामसुन्दर के कुंज में उनकी सेवा में लगे रहते थे।

बलराम के पिताजी पुराने मत के वैष्णव हैं। अनेक वैष्णव भक्त, शाक्त, शैव और वेदान्तवादियों के साथ सहानुभूति नहीं रखते हैं; कोई कोई उनसे द्वेष भी करते हैं। परन्तु श्रीरामकृष्ण इस प्रकार की संकीर्णता पसन्द नहीं करते। उनका कहना है कि व्याकुलता रहने पर सभी पथों तथा सभी मतों से ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। अनेक वैष्णव भक्त बाहर से तो जप-जाप, पूजा-पाठ आदि करते हैं, परन्तु भगवान् को प्राप्त करने के लिए उनमें व्याकुलता नही है। सम्भव है इसीलिए श्रीरामकृष्ण बलराम के पिताजी को उपदेश दे रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (मास्टर के प्रति) – सोचा, क्यों एकांगी बनूँ? मैंने भी वृन्दावन में वैष्णव वैरागी का भेष ग्रहण किया था। उस भाव में तीन दिन रहा। फिर दक्षिणेश्वर में राम-मन्त्र लिया था। लम्बा तिलक, गले में कण्ठी; फिर थोड़े दिनों के बाद सब कुछ हटा दिया।

"एक आदमी के पास एक बर्तन था। लोग उसके पास कपड़ा रँगवाने के लिए जाते थे। बर्तन में एक रंग तैयार रहता। परन्तु जिसे जिस रंग की आवश्यकता होती, उस बर्तन में कपड़ा डुबाने से वह उसी रंग का हो जाता। यह देखकर एक व्यक्ति विस्मित होकर रंगवाले से कहता है कि तुम स्वयं जिस रंग से रंगे हो वही रंग मुझे दो!”

क्या इस उदाहरण द्वारा श्रीरामकृष्ण यही कह रहे हैं कि सभी धर्मों के लोग उनके पास आएँगे और आत्मज्ञान प्राप्त करेंगे?

श्रीरामकृष्ण फिर कह रहे हैं, "एक वृक्ष पर एक गिरगिट था! एक व्यक्ति ने देखा हरा, दूसरे ने देखा काला और तीसरे ने पीला, इस प्रकार अलग अलग व्यक्ति अलग अलग रंग देख गए। बाद में वे आपस में विवाद कर रहे हैं। एक कहता है, वह जन्तु हरे रंग का है। दूसरा कहता है, नहीं लाल रंग का, कोई कहता है पीला, और इस प्रकार आपस में सब झगड़ रहे हैं। उस समय वृक्ष के नीचे एक व्यक्ति बैठा था, सब मिलकर उसके पास गए। उसने कहा, 'मैं इस वृक्ष के नीचे रातदिन रहता हूँ, मैं जानता हूँ, यह बहुरुपिया है। क्षण क्षण में रंग बदलता है, और फिर कभी कभी इसके कोई रंग नहीं रहता।' "

क्या श्रीरामकृष्ण यही कह रहे हैं कि ईश्वर सगुण है, भिन्न भिन्न रूप धारण करता है और फिर निर्गुण है, कोई रूप नहीं, वाक्य मन से परे है? और वे स्वयं भक्तियोग, ज्ञानयोग आदि सभी पथों से ईश्वर के माधुर्य का रस पीते हैं?

श्रीरामकृष्ण (बलराम के पिता के प्रति) – और अधिक पुस्तकें न पढ़ो, परन्तु भक्तिशास्त्र का अध्ययन करो, जैसे श्रीचैतन्यचरितामृत।