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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

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पृष्ठ 353
३३०श्रीरामकृष्णवचनामृत१६ अक्तूबर, १८८३

भक्तिमत में अवतार मानते हैं। कर्ताभजा सम्प्रदाय की एक स्त्री मेरी स्थिति को देखकर कह गयी, 'बाबा, भीतर वस्तुप्राप्ति हुई है उतना नाचना-कूदना नहीं, अंगूर के फल को रूई पर यत्न से रखना होता है। पेट में बच्चा होने पर सास अपनी बहु का धीरे धीरे काम बन्द करा देती है। भगवान् के दर्शन का लक्षण है, धीरे धीरे कर्मत्याग होना। यह मनुष्य (श्रीरामकृष्ण) 'नर रत्न' है।'

“मेरे खाते समय वह कहती थी, 'बाबा, तुम खा रहे हो या किसी को खिला रहे हो?'

“इस 'अहं' ज्ञान ने ही आवरण बनाकर रखा है। नरेन्द्र ने कहा था, यह 'मैं' जितना जाएगा, 'उनका मैं' उतना ही आएगा। केदार कहता है, घड़े के भीतर जितनी ही अधिक मिट्टी रहेगी” अन्दर उतना ही जल कम रहेगा।

“कृष्ण ने अर्जुन से कहा था, 'भाई, अष्टसिद्धियों में से एक भी सिद्धि के रहते तक मुझे न पाओगे। उससे थोड़ीसी शक्ति अवश्य मिल जाती है, पर बस केवल इतना ही। गुटिकासिद्धि, झाड़-फूक, दवा देना इत्यादी से लोंगों का कुछ थोड़ा-बहुत उपकार भर हो जाता है, क्यों है न यही?

“इसीलिए माँ से मैंने केवल शुद्धा भक्ति माँगी थी! सिद्धि नहीं माँगी।”

बलराम के पिता, वेणी पाल, मास्टर, मणि मल्लिक आदि से यह बात कहते कहते श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो गए। बाह्यज्ञानशून्य होकर चित्र की तरह बैठे हैं।

समाधि भंग हो जाने के बाद श्रीरामकृष्ण गाना गा रहे हैं –

(भावार्थ) – “सखि! जिसके लिए पागल बनी उसे कहाँ पा सकी?”

अब आपने रामलाल से गाना गाने के लिए कहा। वे गा रहे हैं। पहले ही गौरांग का संन्यास –

(भावार्थ) – “केशवभारती की कुटिया में मैंने क्या देखा – असाधारण ज्योतिवाली श्रीगौरांग की मूर्ति, जिसकी दोनों आँखों से शत धाराओं से प्रेमवारि बह रहा है। गौर पागल हाथी की तरह प्रेम के आवेश में आकर नाचते हैं, गाते हैं; कभी भूमि पर लोटते हैं। आँसू बह रहे हैं। वे रोते हैं और हरिनाम उच्चारण करते हैं, उनका सिंह जैसा उच्च स्वर आकाश को भी भेद रहा है। फिर वे दाँतों में तिनका लेकर हाथ जोड़कर द्वार द्वार पर दास्यभाव द्वारा मुक्ति की प्रार्थना कर रहे हैं।”

चैतन्यदेव के इस 'पागल' प्रेमोन्माद-स्थिति के वर्णन के बाद श्रीरामकृष्ण के कहने पर रामलाल फिर गोपियों की उन्माद स्थिति का गाना गा रहे हैं –

(भावार्थ) – “रथचक्र को न पकड़ो, न पकड़ो, क्या रथ चक्र से चलता है? उस चक्र के चक्री हरि हैं, जिनके चक्र से जगत् चलता है।”

(भावार्थ) – “श्यामरूपी चन्द्र का दर्शन कर नवीन बादल की कहाँ गिनती है? हाथ में बंसरी और ओठों पर मुसकान लिये वह अपने रूप से जगत् को आलोकित कर रहा है।”

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