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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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१५ जून, १८८४परिच्छेद ८२५२१

कहा, यह सब काम अनासक्त होकर कर सको तो अच्छा है, परन्तु है यह बड़ा कठिन। और चाहे जो हो, कम से कम इतना याद रहे कि तुम्हारे मनुष्य-जीवन का उद्देश्य है ईश्वर-लाभ – अस्पताल और दवाखाना बनाना नहीं। सोचो कि ईश्वर तुम्हारे सामने आये, आकर तुमसे कहा, कोई वर माँगो। तो क्या तुम उनसे कहोगे, मेरे लिए कुछ अस्पताल और दवाखाने बनवा दो या यह कहोगे, 'हे भगवन्, तुम्हारे पादपद्मों में मेरी शुद्धा भक्ति हो – मैं तुम्हें सब समय देख सकूँ।' अस्पताल, दवाखाना ये सब अनित्य वस्तुएँ हैं। एकमात्र ईश्वर वस्तु है, और सब अवस्तु। उन्हें प्राप्त कर लेने पर जान पड़ता है, कर्ता वे ही हैं, हम लोग अकर्ता हैं। तो फिर क्यों उन्हें छोड़कर इतने काम इकट्ठे कर हम अपनी जान दें? उन्हें पा लेने पर उनकी इच्छा से कितने ही अस्पताल और दवाखाने हो जायेंगे।

“इसीलिए कहता हूँ, कर्म आदिकाण्ड है, कर्म जीवन का उद्देश्य नहीं, साधना करके और भी आगे बढ़ जाओ। साधना करते हुए जब और आगे बढ़ जाओगे, तब अन्त में समझोगे, ईश्वर ही एकमात्र वस्तु है, और सब अवस्तु, ईश्वरलाभ ही जीवन का उद्देश्य है। एक लकड़हारा जंगल में लकड़ी काटने गया था। एकाएक किसी ब्रह्मचारी से उसकी भेंट हो गयी। ब्रह्मचारी ने कहा, 'सुनो जी, बढ़ते जाओ।' लकड़हारा घर लौटकर सोचने लगा, ब्रह्मचारी ने आगे बढ़ने के लिए क्यों कहा।

“इसी तरह कुछ दिन बीत गये। एक दिन वह बैठा हुआ था, एकाएक ब्रह्मचारी की बात याद आ गयी। तब उसने मन ही मन कहा, मैं आज और भी आगे बढ़ जाऊँगा। वन में और भी आगे चलकर उसने देखा, चन्दन के हजारों पेड़ थे। तब मारे आनन्द के लोटपोट हो गया। चन्दन की लकड़ी उस दिन घर ले आया। बाजार में बेचकर खूब धनी हो गया।

“और भी बढ़ने पर ईश्वर की प्राप्ति होगी, उनके दर्शन होंगे। क्रमशः उनके साथ मुलाकात और बातचीत होगी।”

केशव के स्वर्गलाभ के पश्चात् मन्दिर की वेदी को लेकर जो विवाद हुआ था, अब उसकी बात होने लगी।

श्रीरामकृष्ण – (प्रताप से) – सुना है, तुम्हारे साथ वेदी के सम्बन्ध में कोई झगड़ा हुआ है। जिन लोगों ने झगड़ा किया है, वे तो सब ऐसे ही हैं। – मानो कीड़े-मकोड़े। (सब हँसते हैं।)

(भक्तों को) “देखो, प्रताप और अमृत ये सब शंख की तरह बजते हैं। और दूसरे आदमियों को देखो, उनमें कोई आवाज ही नहीं हैं।' (सब हँसते हैं।)

प्रताप – महाराज, बजने की बात अगर आपने चलायी तो आम की गुठली भी तो बजती है!

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