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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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२४ मई, १८८४ परिच्छेद ८० ४९९

था।

“कोलूटोला के मकान पर भेंट हुई। हृदय साथ था। केशव सेन जिस कमरे में था, उसी कमरे में हमें बैठाया। मेज पर शायद कुछ लिख रहा था, बहुत देर बाद कलम छोड़कर कुर्सी से नीचे उतरकर बैठा। हमें नमस्कार आदि कुछ नहीं किया।

“यहाँ पर कभी आता था। मैंने एक दिन भावविभोर स्थिति में कहा, 'साधु के सामने पैर पर पैर रखकर नहीं बैठना चाहिए; उससे रजोगुण की वृद्धि होती है।' वह जब भी आता, मैं स्वयं उसे नमस्कार करता था; तब उसने धीरे धीरे भूमिष्ठ होकर नमस्कार करना सीखा।

“फिर मैंने केशव से कहा, 'तुम लोग हरिनाम किया करो, कलियुग में उनके नाम-गुणों का कीर्तन करना चाहिए।' तब उन लोगों ने खोल-करताल लेकर हरिनाम करना प्रारम्भ किया।*

“हरिनाम में मेरा और भी विश्वास क्यों हुआ? इसी देवमन्दिर में बीच बीच में सन्त लोग आया करते हैं। एक मुलतान का साधु आया था, गंगासागर के यात्रियों के लिए प्रतीक्षा कर रहा था। (मास्टर को दिखाकर) इन्हीं की उम्र का होगा वह साधु। उसीने कहा था, उपाय नारदीय भक्ति।

“केशव एक दिन आया था। रात के दस बजे तक रहा। प्रताप तथा अन्य किसी किसी ने कहा, 'आज यहीं रहेंगे।' हम सब लोग वटवृक्ष के नीचे (पंचवटी में) बैठे थे। केशव ने कहा, 'नहीं, काम है, जाना होगा।'

“उस समय मैंने हँसकर कहा, मछली की टोकरी की गन्ध न होने पर क्या नींद नहीं आयेगी? एक मछली बेचनेवाली एक माली के घर अतिथि बनी थी। मछली बेचकर आ रही थी, साथ में मछली की टोकरी थी। उसे फूलवाले कमरे में सोने को दिया गया। फूलों की गन्ध से उसे अधिक रात तक नींद नहीं आयी। घरवाली ने उसकी यह दशा देखकर कहा, 'क्यों तुम छटपटा क्यों रही हो?' उसने कहा, 'कौन जाने भाई! शायद इस फूल की गन्ध से ही नींद नहीं आ रही है। मेरी मछली की टोकरी जरा ला दो तो सम्भव है नींद आ जाय।' अन्त में मछली की टोकरी लायी। उस पर जल छिड़ककर उसने नाक के पास रख ली। फिर खर्राटे के साथ सो गयी!

“कहानी सुनकर केशव के दलवाले जोर से हँसने लगे।

“केशव ने सायंकाल के बाद गंगाघाट में उपासना की। उपासना के बाद मैंने केशव


* श्री केशव सेन खोल-करताल लेकर कुछ वर्षों से ब्रह्मनाम कर रहे थे। श्रीरामकृष्ण के साथ १८७५ में साक्षात्कार होने के बाद से विशेष रूप से हरिनाम तथा माँ के नाम का 'खोल-करताल' लेकर कीर्तन करने लगे।

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar