श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
पृष्ठ 523, कुल 711 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५०० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २४ मई, १८८४ |
|---|
से कहा, 'देखो, भगवान ही एक रूप में भागवत बने हैं, इसीलिए वेद, पुराण, तन्त्र इन सब की पूजा करनी चाहिए। फिर एक रूप में वे भक्त बने हैं; भक्त का हृदय उनका बैठकघर है। बैठकघर में जाने से अनायास ही बाबू का दर्शन होता है। इसीलिए भक्त की पूजा से भगवान की पूजा होती है।'
“केशव तथा उनके दलवालों ने इन बातों को बड़े ही ध्यान से सुना। पूर्णिमा की रात, चारों ओर चाँदनी फैली हुई थी। गंगातट पर सीढ़ी के ऊपर हम सब लोग बैठे हुए थे। मैंने कहा, सभी लोग कहो, 'भागवत भक्त भगवान।'
“उस समय सभी ने एक स्वर से कहा, 'भागवत भक्त भगवान।' फिर मैंने कहा, 'कहो ब्रह्म ही शक्ति, शक्ति ही ब्रह्म है।' उन्होंने फिर एक स्वर से कहा, 'ब्रह्म ही शक्ति, शक्ति ही ब्रह्म है।' मैंने उनसे कहा, 'जिसे तुम ब्रह्म कहते हो, उसी को मैं माँ कहता हूँ। माँ बहुत मीठा नाम है।'
“जब फिर उनसे कहा, 'फिर कहो, गुरु कृष्ण वैष्णव।' उस समय केशव बोला, 'महाराज, उतनी दूर नहीं। इससे तो सभी लोग हमें कट्टर वैष्णव समझेंगे।'
“केशव से बीच बीच में कहता था, जिसे तुम लोग ब्रह्म कहते हो, उसी को मैं शक्ति, आद्याशक्ति कहता हूँ। जिस समय वे वाणी एवं मन से परे, निर्गुण, निष्क्रिय हैं, उस समय वेद में उन्हें ब्रह्म कहा है। जब देखता हूँ कि वे सृष्टि, स्थिति, प्रलय कर रहे हैं, तब उन्हें शक्ति, आद्याशक्ति आदि सब कहता हूँ।
“केशव से कहा, 'गृहस्थी में रहकर साधना होना बड़ा कठिन है – जिस कमरे में अचार, इमली और जल का घड़ा हो उस कमरे में रहकर सन्निपात का रोगी कैसे अच्छा हो सकता है? इसीलिए बीच बीच में साधन-भजन करने के लिए निर्जन स्थान में चले जाना चाहिए। वृक्ष का तना मोटा होने पर उसमें हाथी बाँध दिया जा सकता है, परन्तु पौधों को गाय-बछिया-बकरे चर जाते हैं।' इसीलिए केशव ने व्याख्यान में कहा, 'तुम लोग पक्के बनकर संसार में रहो।'
(भक्तों के प्रति) “देखो, केशव इतना बड़ा पण्डित, अंग्रेजी में लेक्चर देता था, कितने लोग उसे मानते थे, स्वयं सम्राज्ञी विक्टोरिया ने उसके साथ बैठकर बातचीत की है। परन्तु वह जब यहाँ आता था, तो नंगे बदन; साधुओं का दर्शन करना हो तो हाथ में कुछ लाना चाहिए, इसीलिए फल हाथ में लेकर आता था। बिलकुल अभिमानशून्य।
(अधर के प्रति) “देखो तुम इतने बड़े विद्वान, फिर डेपुटी हो, फिर भी स्त्री के ऐसे वश में हो। आगे बढ़ो। चन्दन की लकड़ी के बाद भी और अच्छी अच्छी चीजें हैं; चाँदी की खान, उसके बाद सोने की खान, उनके बाद हीरा, जवाहिरात। लकड़हारा वन में लकड़ी काट रहा था, इसीलिए ब्रह्मचारी ने उससे कहा, 'आगे बढ़ो।' ”
शिवमन्दिर से उतरकर श्रीरामकृष्ण आँगन में से होकर अपने कमरे की ओर आ रहे