श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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कुछ समय पूर्व ही वहाँ एक भैरवी ब्राह्मणी पधारी थीं। उन्होंने भी श्रीरामकृष्ण से अनेक प्रकार की तन्त्रोक्त साधनाएँ करायी थीं।
श्री वैष्णवचरण जो एक वैष्णव पण्डित थे, श्रीरामकृष्ण के पास बहुधा आया करते थे। वैष्णवचरण ने मथुरबाबू से कहा था यह उन्माद साधारण नहीं वरन् दैवी है। एक बार श्रीरामकृष्ण कलूटोला की हरिसभा में गये थे। वहाँ वे समाधिस्थ हो गये और चैतन्यदेव के आसन पर जा विराजे। श्रीचैतन्य की भाँति श्रीरामकृष्ण की कभी 'अन्तर्दशा', कभी 'अर्धबाह्य' और कभी 'बाह्य दशा' हो जाया करती थी। वे कहते थे कि अखण्ड सच्चिदानन्द परब्रह्म और माँ सब एक ही हैं।
उन्होंने कामिनी-कांचन का पूर्ण रूप से त्याग किया था। अपने भक्तगणों को, जो सैकड़ों की संख्या में उनके पास आते थे, वे कहा करते थे कि ये दोनों चीजें ईश्वरप्राप्ति के मार्ग में विशेष रूप से बाधक हैं। बुरे आचरणवाली नारी में भी वे जगन्माता का साक्षात् स्वरूप देखते थे और उसी भाव से आदर करते थे। उनका कांचनत्याग इतना पूर्ण था कि यदि वे पैसे या रुपये को छू लेते तो उनकी उँगलिया ही टेढ़ीमेढ़ी होने लगती थीं। कभी कभी वे गिन्नियों और मिट्टी को एक साथ अंजुली में लेकर गंगाजी के किनारे बैठ जाते थे और 'मिट्टी पैसा, पैसा मिट्टी' कहते हुए दोनों चीजों को मलते मलते श्रीगंगाजी की धार में बहा देते थे।
माता चन्द्रमणि को श्रीरामकृष्ण जगज्जननी का स्वरूप मानते थे। अपने ज्येष्ठ भ्राता श्री रामकुमार के स्वर्गलाभ के बाद श्रीरामकृष्ण उन्हें अपने ही पास रखते थे और उनकी पूजा करते थे।
मथुरबाबू तथा उनकी पत्नी जगदम्बा दासी के साथ वे एक बार वाराणसी, प्रयाग तथा वृन्दावन भी गये थे। उस समय हृदयराम भी साथ में थे। वाराणसी में उन्होंने मणिकर्णिका में समाधिस्थ होकर भगवान् शंकर के दर्शन किये और मौनव्रतधारी त्रैलंग स्वामी से भेंट की। मथुरा में तो उन्होंने साक्षात् भगवान् आनन्दकन्द, सच्चिदानन्द, अन्तर्यामी श्रीकृष्ण के दर्शन किये। कैसी उच्च भावदशा रही होगी!
'सेस, महेस, गनेस, दिनेस, सुरेशहुँ जाहि निरन्तर गावें, जाहि अनादि, अनन्त, अखण्ड, अछेद, अभेद सुवेद बतावें।'
(— श्रीरसखानि)
उन्हीं भगवान् श्रीकृष्ण को उन्होंने यमुना पार करते हुए गौओ को गोधूलि समय वापस लाते देखा और ध्रुवघाट पर से वसुदेव की गोद में भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन किये।
श्रीरामकृष्ण तो कभी कभी समाधिस्थ हो कहते थे, 'जो राम थे और जो कृष्ण थे वही अब रामकृष्ण होकर आये हैं।'