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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

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प्रस्तावना

(प्रथम संस्करण)

भगवान् श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव का जीवन नितान्त आध्यात्मिक था। ईश्वरीय भाव उनके लिए ऐसा ही स्वाभाविक था जैसा किसी प्राणी के लिए श्वास लेना। उनके जीवन का प्रत्येक क्षण मनुष्य-मात्र के लिए आदेशप्रद कहा जा सकता है तथा उनके उपदेश विशेष रूप से अध्यात्म-गर्भित हैं और सार्वलौकिक होते हुए मानव जीवन पर अपना प्रभाव डालने में अद्वितीय हैं।

श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव का संभाषण तथा उनके उपदेशों का सर्वप्रथम संकलन तथा संपादन उनके एक अनन्य गृहस्थ भक्त श्रीम (श्री महेन्द्रनाथ गुप्त) ने ५ जिल्दों में ‘श्रीरामकृष्ण कथामृत’ के नाम से किया था। कुछ समय बाद इन ग्रन्थों का अनुवाद किया गया तथा यह अनुवाद क्रमपूर्वक मासिक हिन्दी पत्रिका ‘समन्वय’ में प्रकाशित हुआ। अनुवाद में संभाषणों तथा उपदेशों का क्रम तारीखवार रखा गया। ‘समन्वय’ पत्रिका मायावती अद्वैत आश्रम, हिमालय से प्रकाशित होती थी और इसके कुशल संपादक थे श्री स्वामी माधवानन्दजी, जो आजकल श्रीरामकृष्ण मठ तथा मिशन के मंत्री हैं। इन ग्रन्थों के हिन्दी अनुवाद का श्रेय हिन्दी संसार के लब्धप्रतिष्ठ लेखक तथा सुविख्यात छायावादी कवि श्री पं. सूर्यकान्तजी त्रिपाठी ‘निराला’ को है। इस महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए हम श्री ‘निराला’जी के विशेष आभारी हैं। बंगला भाषा का पूर्ण ज्ञान रखने के कारण श्री निरालाजी ने अनुवाद में केन्द्रीय भावों तथा शैली आदि को ज्यों का त्यों रखा है और साथ ही साथ साहित्यिक दृष्टि से भी उसे बहुत ऊँचा बनाया है।

श्री स्वामी पवित्रानन्दजी, अध्यक्ष, मायावती, अद्वैत आश्रम, के भी हम बड़े कृतज्ञ हैं जिन्होंने हमें उस पुस्तक की सारी सामग्री दी है तथा इसको पुस्तक रूप में प्रकाशित करने की अनुमति।

साहित्य-शास्त्री प्रोफेसर श्री पं. विद्याभास्करजी शुक्ल, एम्.एस्.सी., पी.ई.एस्., कॉलेज ऑफ साइन्स, (नागपुर यूनिवर्सिटी) नागपुर, के प्रति भी हम अपनी कृतज्ञता प्रकट किए बिना नहीं रह सकते हैं। प्रो. शुक्लजी ने निर्मल भक्ति-भाव से इस पुस्तक में दी हुई श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव की सुन्दर, संक्षेप जीवनी लिखी है। यह जीवनी परमहंस महाराज के उपदेशों के लिए प्रस्तावना के रूप में विशेष लाभदायक होगी। श्री शुक्ल जी ने इस पुस्तक को आद्योपान्त ध्यान से देखा है तथा कई उपयुक्त सूचनाएँ भी दी

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar