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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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भगवान् श्रीरामकृष्णदेव की

संक्षिप्त जीवनी

हम यह देखते हैं कि श्रीरामचन्द्र तथा भगवान् बुद्ध को छोड़कर बहुधा अन्य सभी अवतारी महापुरुषों का जन्म संकटग्रस्त परिस्थितियों में ही हुआ है, और यह कहा जा सकता है कि भगवान् श्रीरामकृष्ण भी किसी विशेष प्रकार के सुखद वातावरण में इस संसार में अवतरित नहीं हुए।

श्रीरामकृष्ण का जन्म हुगली प्रान्त के कामारपुकुर गाँव में एक श्रेष्ठ ब्राह्मण परिवार में शकाब्द १७५७ फाल्गुन मास की शुक्लपक्ष द्वितीया तदनुसार बुधवार ता. १७ फरवरी १८३६ ई. को हुआ। कामारपुकुर गाँव बर्दवान से लगभग चौबीस-पचीस मील दक्षिण तथा जहानाबाद (आरामबाग) से लगभग आठ मील पश्चिम में है।

श्रीरामकृष्ण के पिता श्री क्षुदिराम चट्टोपाध्याय परम सन्तोषी, सत्यनिष्ठ एवं त्यागी पुरुष थे, और उनकी माता श्री चन्द्रमणि देवी सरलता तथा दयालुता की मूर्ति थीं। यह आदर्श दम्पति पहले देरे नामक गाँव में रहते थे, परन्तु वहाँ के अन्यायी जमींदार की कुछ जबरदस्तियों के कारण इन्हें वह गाँव छोड़कर करीब तीन मील की दूरी पर इसी कामारपुकुर गाँव में आ बसना पड़ा।

बचपन में श्रीरामकृष्ण का नाम गदाधर था। अन्य बालकों की भाँति वे भी पाठशाला भेजे गये, परन्तु एक ईश्वरी अवतार एवं संसार के पथ-प्रदर्शक को उस 'अ, आ, इ, ई' की पाठशाला में चैन कहाँ? बस, जी उचटने लगा, और मन लगा घर में स्थापित आनन्दकन्द सच्चिदानन्द भगवान् श्रीरामजी की मूर्ति में – स्वयं वे फूल तोड़ लाते और इच्छानुसार मनमानी उनकी पूजा करते।

कहते हैं कि अवतारी पुरुषों में कितने ही ऐसे गुण छिपे रहते हैं कि उनका अनुमान करना कठिन होता है। श्री गदाधर की स्मरणशक्ति विशेष तीव्र थी। साथ ही उन्हें गाने की भी रुचि थी और विशेषतः भक्तिपूर्ण गानों के प्रति।

साधु-संन्यासियो के जत्थों के दर्शन तो मानो इनकी जीवनी में संजीवनी का कार्य करते थे। अपने घर के पास लाहा की अतिथिशाला में जहाँ बहुधा संन्यासी उतरा करते थे, इनका काफी समय जाता था। मुहल्ले के बालक, वृद्ध, सभी ने न जाने इनमें कौनसा दैवी गुण परखा था कि वे सब इनसे बड़े प्रसन्न रहते थे। रामायण, महाभारत, गीता आदि के श्लोक ये केवल बड़ी भक्ति से सुनते ही नहीं थे, वरन् उनमें से बहुतसे उन्हें सहजरूप

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar