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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

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१३०श्रीरामकृष्णवचनामृत१४ दिसम्बर १८८२

परन्तु सादे शीशे पर चाहे हजारों चित्र दिखाए जाए, एक भी नहीं उतरता। शीशे पर से चित्र हटा कि वही ज्यों का त्यों सफेद शीशा! ईश्वर पर प्रीति हुए बिना उपदेशों की धारणा नहीं होती।”

विजय – महाराज, ईश्वर को कोई प्राप्त करना चाहे, उनके दर्शन करना चाहे, तो क्या सिर्फ भक्ति से काम सध जाएगा?

श्रीरामकृष्ण – हाँ, भक्ति ही से उनके दर्शन हो सकते हैं। परन्तु पक्की भक्ति, प्रेमाभक्ति, रागभक्ति चाहिए। उसी भक्ति से उन पर प्रीति होती है, जैसा बच्चों का माँ पर प्यार, माँ का बच्चे पर प्यार और पत्नी का पति पर प्यार होता है।

“इस प्यार, इस रागभक्ति के होने पर, स्त्री-पुत्र और आत्मीय परिवार की ओर पहले जैसा आकर्षण नहीं रह जाता, फिर तो उन पर दया होती है। घर-द्वार विदेश जैसा जान पड़ता है, उसे देखकर सिर्फ एक कर्मभूमि का ख्याल जागता है; जैसे घर देहात में और कलकत्ता है कर्मभूमि, कलकत्ते में किराये के मकान में रहना पड़ता है कर्म करने के लिए। ईश्वर पर प्यार होने से संसार की आसक्ति – विषयबुद्धि – बिलकुल जाती रहेगी!

“विषयबुद्धि का लेशमात्र रहते उनके दर्शन नहीं हो सकते। दियासलाई अगर भीगी हो तो चाहे जितना रगड़ो वह जलती ही नहीं – बीसों दियासलाई व्यर्थ ही बरबाद हो जाती हैं। विषयासक्त मन भीगी दियासलाई है।

“श्रीमती (राधिका) ने जब कहा, ‘मैं सर्वत्र कृष्णमय देखती हूँ’, तब सखियाँ बोलीं, ‘कहाँ, हम तो उन्हें नहीं देखतीं तुम प्रलाप तो नहीं कर रही हो?’ श्रीमती बोलीं, ‘सखियों, नेत्रों में अनुराग का अंजन लगा लो, तभी उन्हें देखोगी।’ (विजय से) तुम्हारे ब्राह्मसमाज ही के भजन में है – ‘प्रभो, बिना अनुराग के यज्ञ-यागादि करके क्या तुम्हें जाना जा सकता है?’

“यह अनुराग, यह प्रेम, यह सच्ची भक्ति, यह प्यार यदि एक बार भी हो तो साकार और निराकार दोनों मिल जाते हैं।”

ईश्वर-दर्शन उनकी कृपा बिना नहीं होता

विजय – महाराज, क्या किया जाय जो ईश्वर-दर्शन हो।

श्रीरामकृष्ण – चित्तशुद्धि के बिना ईश्वर के दर्शन नहीं होते। कामिनी-कांचन में पड़कर मन मलिन हो गया है, उसमें जंग लग गया है। सुई में कीच लग जाने से उसे चुम्बक नहीं खींच सकता, मिट्टी साफ कर देने ही से चुम्बक खींचता है। मन का मैल नेत्रजल से धोया जा सकता है। ‘हे ईश्वर, अब ऐसा काम न करूँगा’ यह कहकर यदि कोई अनुताप करता हुआ रोये तो मैल धुल जाता है। तब ईश्वररूपी चुम्बक मनरूपी सुई को खींच लेता है। तब समाधि होती है, ईश्वर के दर्शन होते हैं।