श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context११ मार्च, १८८३ परिच्छेद २६ १५९
उत्तर यह है कि उनकी ज्योति जड़ ज्योति नहीं है। सभा में बैठे हुए सब लोगों के हृदयकमल खिल उठे। सूर्य के निकलने से कमल खिल जाते हैं।”
श्रीरामकृष्ण खड़े होकर भक्तों से यह कह ही रहे थे कि एकाएक उनका मन बाहरी जगत् को छोड़ भीतर की ओर मुड़ गया। “हृदयकमल खिल उठे” – ये शब्द कहते ही आप समाधिमग्न हो गये।
श्रीरामकृष्ण उसी अवस्था में खड़े हैं। क्या भगवान् के दर्शन से आपका हृदयकमल खिल उठा? बाहरी जगत् का कुछ भी ज्ञान आपको नहीं है। मूर्ति की तरह आप खड़े हैं। मुँह उज्ज्वल और सहास्य है। भक्तों में से कुछ खड़े और कुछ बैठे हैं, सभी निर्वाक् होकर टकटकी लगाए प्रेमराज्य की इस अनोखी छवि को – इस अपूर्व समाधिदृश्य को – देख रहे हैं।
बड़ी देर बाद समाधि टूटी। श्रीरामकृष्ण लम्बी साँस छोड़कर बारम्बार रामनाम उच्चारण कर रहे हैं। नाम के प्रत्येक वर्ण से मानो अमृत टपक रहा है। श्रीरामकृष्ण बैठे। भक्त भी चारों तरफ बैठकर उनको एकटक देख रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (भक्तों से) – जब अवतार आते हैं, तो साधारण लोग उनको नहीं जान सकते। वे छिपकर आते हैं। दो ही चार अन्तरंग भक्त उनको जान सकते हैं। राम पूर्णब्रह्म थे, पूर्ण अवतार थे, यह बात केवल बारह ऋषियों को मालूम थी। अन्य ऋषियों ने कहा था, 'राम, हम तो तुमको दशरथ का बेटा ही समझते हैं।'
“अखण्ड सच्चिदानन्द को सब कोई थोड़े ही समझ सकते हैं! परन्तु भक्ति उसी की पक्की है, जो नित्य को पहुँचकर विलास के उद्देश्य से लीला लेकर रहता है। विलायत में क्वीन (रानी) को जब देखकर आओ, तब क्वीन की बातें, क्वीन के कार्य, इन सब का वर्णन हो सकता है। क्वीन के विषय में कहना तभी ठीक उतरता है। भरद्वाज आदि ऋषियों ने राम की स्तुति की थी और कहा था, 'हे राम, तुम्हीं वह अखण्ड सच्चिदानन्द हो! हमारे सामने तुम मनुष्य के रूप में अवतीर्ण हुए हो। सच तो यह है कि माया के द्वारा ही तुम मनुष्य जैसे दिखते हो।' भरद्वाज आदि ऋषि राम के परम भक्त थे। उन्हीं की भक्ति पक्की है।”
(४)
कीर्तन का आनन्द तथा समाधि
भक्त निर्वाक् होकर यह अवतार-तत्त्व सुन रहे हैं। कोई कोई सोच रहे हैं, 'क्या आश्चर्य है! वेदोक्त अखण्ड सच्चिदानन्द – जिन्हें वेद ने मन-वचन से परे बताया है – क्या वे ही हमारे सामने साढ़े-तीन हाथ का मनुष्य-शरीर लेकर आते हैं? जब श्रीरामकृष्ण कहते हैं तो वैसा अवश्य ही होगा! यदि ऐसा न होता तो 'राम राम' कहते हुए इन महापुरुष