BharatKosha
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

Page 311 of 711

Read in context
Page 311
२८८श्रीरामकृष्णवचनामृत२० अगस्त, १८८३

कराए, तो ध्यान होगा। इस पर तुम्हारा क्या मत है?

मास्टर – जी, आप के भीतर 'अहं' का भाव नहीं है, इसीलिए ऐसा प्रतीत हो रहा है। जहाँ 'अहं' नहीं रहता वहाँ ऐसा ही हुआ करता है।

श्रीरामकृष्ण – पर 'मैं दास हूँ, सेवक हूँ' – इतना अहंभाव रहना अच्छा है। जहाँ यह बोध रहता है कि मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ वहाँ 'मैं दास हूँ और तुम प्रभु हो' – यह भाव बहुत अच्छा है। जब सभी कुछ किया जा रहा है, तो सेव्यसेवक-भाव से रहना ही अच्छा है।

मास्टर सदा परब्रह्म के स्वरूप का चिन्तन करते हैं। इसीलिए श्रीरामकृष्ण उनको लक्ष्य करके फिर कह रहे हैं –

“ब्रह्म आकाश की तरह हैं। उनमें कोई विकार नहीं है। जैसे आग के कोई रंग नहीं है। पर हाँ, अपनी शक्ति के द्वारा वे विविध आकार के हुए हैं। सत्त्व, रज, तम – ये तीन गुण शक्ति ही के गुण हैं। आग में यदि सफेद रंग डाल दो, तो वह सफेद दिखेगी। यदि लाल रंग डाल दो, तो वह लाल दिखेगी। यदि काला रंग डाल दो, तो वह काली दिखेगी। ब्रह्म सत्त्व, रज और तम – इन तीनों गुणों से परे हैं। वे यथार्थ में क्या हैं, यह मुँह से नहीं कहा जा सकता। वे वाक्य से परे हैं। 'नेति नेति' (ब्रह्म यह नहीं, वह नहीं) करके विचार करते हुए जो बाकी रह जाता है, और जहाँ आनन्द है, वही ब्रह्म हैं।

“एक लड़की का पति आया है। वह अपने बराबरी के युवकों के साथ बाहरवाले कमरे में बैठा है। इधर वह लड़की और उसकी सहेलियाँ खिड़की से देख रही हैं। सहेलियाँ उसके पति को नहीं पहचानतीं। वे उस लड़की से पूछ रही है, 'क्या वह तेरा पति है?' लड़की मुसकराकर कहती है, – 'नहीं।' एक दूसरे युवक को दिखलाकर वे पूछती हैं, 'क्या वह तेरा पति है?' वह फिर कहती है – 'नहीं।' एक तीसरे युवक को दिखाकर वे फिर पूछती हैं, 'क्या वह तेरा पति है?' वह फिर कहती है – 'नहीं।' अन्त में उसके पति की ओर इशारा करके उन्होंने पूछा, 'क्या वह तेरा पति है?' तब उसने 'हाँ' या 'नहीं' कुछ नहीं कहा; केवल मुसकरायी और चुप्पी साध ली! तब सहेलियों ने समझा कि वही इसका पति है। जहाँ ठीक ब्रह्मज्ञान होता है, वहाँ सब चुप हो जाते हैं।

सत्संग। गृहस्थ के कर्तव्य

(मास्टर से) “अच्छा, मैं बकता क्यों हूँ?”

मास्टर – जैसा आपने कहा कि पके हुए घी में अगर कच्ची पूड़ी छोड़ दी जाय, तो फिर आवाज होने लगती है। आप बोलते हैं भक्तों का चैतन्य कराने के लिए।

श्रीरामकृष्ण मास्टर से हाजरा महाशय की चर्चा करते हैं।

श्रीरामकृष्ण – अच्छे मनुष्य का स्वभाव कैसा है, मालूम है? वह किसी को दुःख