श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context७ सितम्बर, १८८३ परिच्छेद ५१ २९३
फिर दोनों चुप रहे।
मणि – मैं सोचता हूँ, क्यों ये दर्शन सत्य नहीं होंगे? यदि ये मिथ्या हुए तो यह संसार और भी मिथ्या ठहरा, क्योंकि देखने का साधन, मन तो एक ही है। फिर वे दर्शन शुद्ध मन से होते हैं और सांसारिक पदार्थ इसी अशुद्ध मन से देखे जाते हैं।
श्रीरामकृष्ण – इस बार देखता हूँ कि तुम्हें खूब अनित्य का बोध हुआ है। अच्छा, कहो, हाजरा कैसा है?
मणि – वह है एक तरह का आदमी। (श्रीरामकृष्ण हँसे।)
श्रीरामकृष्ण – अच्छा, मुझसे तथा किसी और से कुछ मिलता जुलता है?
मणि – जी नहीं।
श्रीरामकृष्ण – किसी परमहंस से?
मणि – जी नहीं। आपकी तुलना नहीं है।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – तुमने 'अनचीन्हा पेड़' सुना है?
मणि – जी नहीं।
श्रीरामकृष्ण – वह है एक प्रकार का पेड़ जिसे कोई देखकर पहचान नहीं सकता।
मणि – जी, आपको भी पहचानना कठिन है। आपको जो जितना समझेगा वह उतना ही उन्नत होगा।
मणि शान्त होकर विचार कर रहे हैं, – श्रीरामकृष्ण ने जो 'उदय के समय का सूर्य', 'अनचीन्हा पेड़' आदि बातें कहीं, क्या यही अवतार के लक्षण हैं? क्या इसी का नाम नरलीला है? क्या श्रीरामकृष्ण अवतार हैं? क्या इसीलिए वे पार्षदों को देखने के लिए व्याकुल होकर कोठी की छत पर चढ़कर पुकारते थे कि अरे, तुम लोग कौन कहाँ हो, आओ!
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