श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context२७ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ७१ | ४१७
कोई कह रहे हैं, “यह तो मैं नहीं देखता कि ईश्वर का नाम लेने से प्रत्येक समय फल होता है।”
ईशान ने कहा, “यह क्या ? बट का बीज कितना छोटा होता है, परन्तु उसके भीतर कितना बड़ा पेड़ छिपा रहता है पर वह पेड़ देर से दिखायी देता है।
श्रीरामकृष्ण – हाँ हाँ, फल देर से होता है।
ईशान का मकान उनके ससुर स्वर्गीय श्री क्षेत्रनाथ चटर्जी के मकान के पूर्व ओर है। दोनों मकानों में आने-जाने का रास्ता है। श्रीरामकृष्ण चटर्जी महाशय के मकान के फाटक के पास आकर खड़े हुए। ईशान अपने बन्धु-बान्धवों को साथ लेकर श्रीरामकृष्ण को गाड़ी पर चढ़ाने के लिए आए हैं।
श्रीरामकृष्ण ईशान से कह रहे हैं, “तुम संसार में ठीक ‘पाँकाल’ मछली की तरह हो। वह रहती तो है तालाब के बीच में, पर उसकी देह में कीच छू नहीं जाती।
“माया के इस संसार में विद्या और अविद्या दोनों ही हैं। परमहंस वह है, जो हंस की तरह दूध और पानी के एक साथ रहने पर भी पानी छोड़कर दूध निकाल लेता है; चींटी की तरह बालू और चीनी के मिले रहने पर भी बालू में से चीनी निकाल ले सकता है।”
( ३ )
समन्वय और निष्ठा भक्ति। अपराध और ईश्वर-कोटि
शाम हो गयी है। श्रीरामकृष्ण भक्त रामचन्द्र के घर आए हुए हैं। यहाँ से होकर दक्षिणेश्वर जाएँगे।
रामचन्द्र के बैठकखाने को आलोकित करते हुए भक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण बैठे हुए हैं। श्री महेन्द्र गोस्वामी से बातचीत कर रहे हैं। गोस्वामीजी उसी मोहल्ले में रहते हैं। श्रीरामकृष्ण इन्हें प्यार करते हैं। जब श्रीरामकृष्ण रामचन्द्र के यहाँ आते हैं तब गोस्वामीजी आकर इनसे मिल जाया करते हैं।
श्रीरामकृष्ण – वैष्णव, शाक्त सब के पहुँचने की जगह एक है; परन्तु मार्ग और और हैं। जो सच्चे वैष्णव हैं, वें शक्ति की निन्दा नहीं करते।
गोस्वामी (सहास्य) – हर-पार्वती हमारे माँ बाप हैं।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – Thank You (थैंक यू) – माँ बाप हैं।
गोस्वामी – इसके सिवाय किसी की निन्दा करने से, खास कर वैष्णवों की निन्दा से, अपराध होता है – वैष्णवापराध। सब अपराधों की क्षमा है, परन्तु वैष्णवापराध की क्षमा नहीं है।
श्रीरामकृष्ण – अपराध सब को नहीं होता। जो ईश्वरकोटि हैं, उनको अपराध नहीं होता। जैसे श्रीचैतन्यसदृश अवतारी पुरुषों को।