श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
Page 52 of 711
Read in context२ अप्रैल, १८८२
परिच्छेद ६
२९
श्रीरामकृष्ण – सभी की मुक्ति होगी। परन्तु गुरु के उपदेश के अनुसार चलना पड़ता है, टेढ़े रास्ते से जाने पर फिर सीधे रास्ते पर आने में कष्ट होगा। मुक्ति बहुत देर में होती है। शायद इस जन्म में न भी हो। फिर सम्भव है अनेक जन्मों के पश्चात् हो। जनक आदि ने संसार में भी कर्म किया था। ईश्वर को सिर पर रखकर काम करते थे। नाचनेवाली जिस-प्रकार सिर पर बर्तन रखकर नाचती है। और पश्चिम की औरतों को नहीं देखा, सिर पर जल का घड़ा लेकर हँस-हँसकर बातें करती हुई जाती हैं?
पड़ोसी – आपने गुरूपदेश के बारे में बताया, पर गुरु कैसे प्राप्त करूँ?
श्रीरामकृष्ण – हरएक गुरु नहीं हो सकता। कीमती शहतीर पानी में स्वयं भी बहता हुआ चला जाता है और अनेक जीव-जन्तु भी उस पर चढ़कर जा सकते हैं। पर मामूली लकड़ी पर चढ़ने से लकड़ी भी डूब जाती है और जो चढ़ता है वह भी डूब जाता है। इसलिए ईश्वर युग युग में लोकशिक्षा के लिए गुरु-रूप में स्वयं अवतीर्ण होते हैं। सच्चिदानन्द ही गुरु हैं।
“ज्ञान किसे कहते हैं; और मै कौन हूँ? 'ईश्वर ही कर्ता हैं और सब अकर्ता' इसी का नाम ज्ञान है। मैं अकर्ता, उनके हाथ का यन्त्र हूँ। इसीलिए मैं कहता हूँ, माँ, तुम यन्त्री हो, मैं यन्त्र हूँ; तुम घरवाली हो, मैं घर हूँ; मैं गाड़ी हूँ, तुम इंजीनियर हो। जैसा चलाती हो वैसा चलता हूँ, जैसा कराती हो वैसा करता हूँ, जैसा बुलवाती हो, वैसा बोलता हूँ; नाहं, नाहं, तू है तू है।”
(२)
'कमलकुटीर' में श्रीरामकृष्ण और श्री केशव सेन
श्रीरामकृष्ण कप्तान के घर होकर श्रीयुत केशव सेन के 'कमलकुटीर' नामक मकान पर आए हैं। साथ हैं राम, मनोमोहन, सुरेन्द्र, मास्टर आदि अनेक भक्त लोग। सब दुमँजले के हाल में बैठे हैं। श्री प्रताप मजुमदार, श्री त्रैलोक्य आदि ब्राह्मभक्त भी उपस्थित हैं।
श्रीरामकृष्ण केशव को बहुत प्यार करते हैं। जिन दिनों बेलघर के बगीचे में वे शिष्यों के साथ साधन-भजन कर रहे थे तब, अर्थात् १८७५ ई. के माघोस्तव के बाद कुछ दिनों के अन्दर ही, एक दिन श्रीरामकृष्ण ने बगीचे में जाकर उनके साथ साक्षात्कार किया था। साथ था उनका भानजा हृदयराम। बेलघर के इस बगीचे में उन्होंने केशव से कहा था, “तुम्हारी दुम झड़ गयी है, अर्थात् तुम सब कुछ छोड़कर संसार के बाहर भी रह सकते हो और फिर संसार में भी रह सकते हो। जिस प्रकार मेंढक के बच्चे की दुम झड़ जाने पर वह पानी में भी रह सकता है और फिर जमीन पर भी।” इसके बाद दक्षिणेश्वर में, कमलकुटीर में, ब्राह्मसमाज आदि स्थानों में अनेक बार श्रीरामकृष्ण ने वार्तालाप के