श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context| १९ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ९१ | ६१७ |
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सकता ही न था, करधनी पहनी तो भीतर से सरसराकर हवा ऊपर की ओर चढ़ने लगी – देह में सोना छू गया न? जरा देर रखकर उसे खोल डाला। नहीं तो उसे तोड़ डालना पड़ता।
“धनियाखाली का कोईचूर (एक तरह की मिठाई), खानाकुल कृष्णनगर का सरभाजा (एक तरह की मिठाई) खाने की भी इच्छा हुई थी। (सब हँसते हैं।)
“शम्भू के चण्डी-गीत सुनने की इच्छा हुई थी। उसके सुन लेने के बाद फिर राजनारायण के चण्डी-गीतों के सुनने की इच्छा हुई। उसके गीतों को भी मैंने सुना।
“उस समय बहुत से साधु आते थे। इच्छा हुई कि उनकी सेवा के लिए एक अलग भण्डार किया जाय। सेजो बाबू ने वैसा ही किया। उसी भण्डार से साधुओं को सीधा, लकड़ी आदि सब दिया जाता था।
“एक बार जी में आया कि खूब अच्छा जरी का साज पहनूँ और चाँदी की गुड़गुड़ी में तम्बाकू पीऊँ। सेजो बाबू ने नया साज, गुड़गुड़ी सब भेज दिया। साज पहना, गुड़गुड़ी कितनी ही तरह से पीने लगा। एक बार इस ओर से, एक बार उस ओर से – खड़ा होकर और बैठकर। तब मैंने कहा, मन, देख ले, इसी का नाम है चाँदी की गुड़गुड़ी में तम्बाकू पीना। बस इतने से ही गुड़गुड़ी का त्याग हो गया। साज थोड़ी देर में खोल डाला – पैरों से उसे रौंदने लगा – कहा, इसी का नाम है साज! इसी पोशाक के कारण रजोगुण बढ़ता है।”
बलराम के साथ राखाल वृन्दावन में हैं। पहले-पहल वे वृन्दावन की बड़ी तारीफ करके चिट्ठी लिखते थे। मास्टर को चिट्ठी लिखी थी – ‘यह बड़ी अच्छी जगह है – मोर नाचते रहते हैं – और नृत्य गीत, सदा ही आनन्द होता है!’ इसके पश्चात् उन्हें बुखार आया, वृन्दावन का बुखार! श्रीरामकृष्ण को बड़ी चिन्ता रहती है। उनके लिए चण्डी के नाम पर उन्होंने मन्नत की है। श्रीरामकृष्ण राखाल की बातें कर रहे हैं – “यहाँ बैठकर पैर दबाते समय राखाल को पहले-पहल भाव हुआ था। एक भागवती पण्डित इस कमरे में बैठा हुआ भागवत की बातें कह रहा था। उन्हीं बातों को सुन-सुनकर राखाल सिहर-सिहर उठता था। इसके बाद वह बिलकुल स्थिर हो गया।
“दूसरी बार बलराम के घर में भाव हुआ था। भावावेश में लेट गया था।
“राखाल साकार की श्रेणी का है, निराकार की बात सुनकर उठ जायगा।
“उसके लिए मैंने चण्डी की मन्नत की। उसने घर-द्वार सब छोड़कर मेरा सहारा लिया था न? उसकी स्त्री के पास उसे मैं ही भेज दिया करता था, भोग कुछ बाकी रह गया था।
“वृन्दावन से इन्हें लिख रहा है, यह बड़ा अच्छा स्थान है – मोरों का नृत्य हुआ करता है। अब मोरों ने विपत्ति में डाल दिया।