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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

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६६२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २९ सितम्बर, १८८४

जमीन पर बैठे हुए हैं। घोषपाड़ा और पंचनामी मतों की बात नरेन्द्र ने चलायी। श्रीरामकृष्ण उनका वर्णन कर रहे हैं :-

“ये लोग ठीक ठीक साधना नहीं कर सकते। धर्म का नाम लेकर इन्द्रियों को चरितार्थ किया करते हैं।

(नरेन्द्र से) “तुझे अब इन मतों के सम्बन्ध में कुछ सुनने की आवश्यकता नहीं है।

“ये जो भैरव-भैरवियाँ हैं, ये सब ऐसे ही हैं। जब मैं काशी गया था, तब एक दिन मुझे भैरवी-चक्र ले गये थे। उनमें एक एक भैरव था और एक एक भैरवी। मुझे कारण-पान करने के लिए कहा। मैंने कहा, माँ, मैं तो कारण छू भी नहीं सकता। तब वे लोग खुद पीने लगे। मैंने सोचा अब शायद ये लोग जपध्यान करेंगे; परन्तु वह तो रहा अलग, वे लोग नाचने लगे। मुझे भय होने लगा कि कहीं गंगाजी में न गिर जायँ। चक्र गंगा के तट पर ही था।

“पति और पत्नी अगर भैरव-भैरवी हो जायँ तो उनका बड़ा सम्मान होता है।

(नरेन्द्र आदि भक्तों से) “मेरा मातृभाव है, सन्तान-भाव। मातृभाव बड़ा शुद्ध भाव है। इसमें कोई विपत्ति नहीं है। भगिनी भाव भी बुरा नहीं स्त्रीभाव या वीरभाव बड़ा कठिन है। तारक का बाप इसी भाव की साधना करता था। बड़ा कठिन है, भाव ठीक नहीं रहता।

“ईश्वर के पास पहुँचने के अनेक मार्ग हैं। सभी मत एक एक मार्ग हैं जैसे काली-मन्दिर जाने की बहुतसी राहें हैं। इनमें भेद इतना ही है कि कोई राह शुद्ध है और कोई राह अशुद्ध; शुद्ध रास्ते से होकर जाना ही अच्छा है।

“मैंने बहुत से मत देखे, बहुत से पथ देखे। यह सब अब और अच्छा नहीं लगता। सब एक दूसरे से विवाद किया करते हैं। यहाँ और कोई नहीं है, तुम सब अपने आदमी हो, तुम लोगों से कह रहा हूँ, अब मैंने यही समझा कि वे पूर्ण हैं और मैं उनका अंश हूँ, वे प्रभु हैं और मैं उनका दास हूँ। कभी यह भी सोचता हूँ कि 'वही' 'मैं' है और 'मैं' ही 'वह' हूँ।”

(भक्तमण्डली स्तब्ध हो सुन रही है।)

भवनाथ – (विनयपूर्वक) – लोगों से मतान्तर होने पर मन न जाने कैसा करने लगता है। इससे यह याद आता है कि सब को मैं प्यार न कर सका।

श्रीरामकृष्ण – पहले एक बार बातचीत करने की, उनसे प्रीतिपूर्वक बर्ताव करने की चेष्टा करना। चेष्टा करने पर भी अगर न हो, तो फिर इसकी चिन्ता न करनी चाहिए। उनकी शरण में जाओ – उनकी चिन्ता करो। उन्हें छोड़कर दूसरे आदमियों के लिए मन में दुःख लाने की क्या जरूरत है?

भवनाथ – ईसा मसीह और चैतन्य, इन लोगों का कहना है कि सब को प्यार करना चाहिए।

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