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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

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२२ अक्तूबर, १८८२परिच्छेद ११७५

"तीर्थ करने गया तो कभी कभी बड़ी तकलीफ होती थी। काशी में मथुरबाबू आदि के साथ राजाबाबुओं की बैठक में गया। वहाँ देखा – सभी लोग विषयों की बातों में लगे हैं! रुपया, जमीन, यही सब बातें। उनकी बातें सुनकर मैं रो पड़ा। माँ से कहा – माँ! तू मुझे कहाँ लायी? दक्षिणेश्वर में तो मैं बहुत अच्छा था। प्रयाग में देखा, – वही तालाब, वही दूब, वही पेड़, वही इमली के पत्ते!

"परन्तु तीर्थ में उद्दीपन अवश्य होता है। मथुरबाबू के साथ वृन्दावन गया। मथुरबाबू के घर की स्त्रियाँ भी थीं; हृदय भी था। कालीयदमन घाट देखते ही उद्दीपना होती थी, – मैं विह्वल हो जाता था! हृदय मुझे यमुना के घाट में बालक की तरह नहलाता था।

"सन्ध्या को यमुना के तट पर घूमने जाया करता था। यमुना के कछार से उस समय गायें चरकर लौटती थीं। देखते ही मुझे कृष्ण की उद्दीपना हुई, पागल की तरह दौड़ने लगा, 'कहाँ कृष्ण, कृष्ण कहाँ,' कहते हुए।

"पालकी पर चढ़कर श्यामकुण्ड और राधाकुण्ड के रास्ते जा रहा था, गोवर्धन देखने के लिए उतरा, गोवर्धन देखते ही बिलकुल विह्वल हो गया, दौड़कर गोवर्धन पर चढ़ गया; बाह्य ज्ञान जाता रहा। तब ब्रजवासी जाकर मुझे उतार लाए। श्यामकुण्ड और राधाकुण्ड के मार्ग का मैदान, पेड़-पौधे, हरिण और पक्षियों को देख विकल हो गया था; आसुओं से कपड़े भीग गए थे; मन में यह आता था कि ऐ कृष्ण, यहाँ सभी कुछ है, केवल तू ही नहीं दिखायी पड़ता। पालकी के भीतर बैठा था, परन्तु एक बात कहने की भी शक्ति नहीं थी, चुपचाप बैठा था। हृदय पालकी के पीछे आ रहा था। कहारों से उसने कह दिया था, खूब होशियार रहना।

"गंगामाई मेरी खूब देखभाल करती थी। उम्र बहुत थी। निधुवन के पास एक कुटी में अकेली रहती थी। मेरी अवस्था और भाव देखकर कहती थी, ये साक्षात् राधिका हैं – शरीर धारण करके आए हैं मुझे दुलारी कहकर बुलाती थी। उसे पाते ही मैं खाना-पीना, घर लौटना सब भूल जाता था। कभी कभी हृदय वहीं भोजन ले जाकर मुझे खिला आता था। वह भी खाना पकाकर खिलाती थी।

"गंगामाई को भावावेश होता था। उसका भाव देखने के लिए लोगों की भीड़ जम जाती थी। भावावेश में एक दिन हृदय के कन्धे पर चढ़ी थी।

"गंगामाई के पास से देश लौटने की मेरी इच्छा न थी। वहाँ सब ठीक हो गया; मैं सिद्ध (भुँजिया) चावल का भात खाऊँगा, गंगामाई का बिस्तरा घर में एक ओर लगेगा, मेरा दूसरी ओर। सब ठीक हो गया। तब हृदय बोला, तुम्हें पेट की शिकायत है, कौन देखेगा? गंगामाई बोली, क्यों, मैं देखूँगी, मैं सेवा करूँगी। एक हाथ पकड़कर हृदय खींचने लगा और दूसरा हाथ पकड़कर गंगामाई। ऐसे समय माँ की याद आ गयी! माँ अकेली कालीमन्दिर के नौबतखाने में है। फिर न रहा गया, तब कहा – नहीं, मुझे जाना