सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
by महाकवि नरोत्तमदास
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Read in context५० / सुदामा-चरित बालपन के मित्र हैं, कहा देउं मैं साप । जैसो हरि हमको दिया, तैसो पइहैं आप ॥६५॥ नौ गुनधारि छगुन सों, तिगुना-मध्ये जाय । लायौँ चापल चौगुनी, आठौ गुननि गँवाय ॥६६॥ और कहा कहिए जहाँ, कंचन ही के धाम । निपट कठिन हरि को हियो, मोको दियो न दाम ॥६७॥ बहु-भंडार रतन-भरे, कौन हरै अब रोष । लाग आपने भाग को, काको दीजै दोष ॥६८॥ इमि सोचत-सोचत झखत, आया निज पुर-तीर । दीठि परी इकबार ही, हय गयंद की भीर ॥६६॥ हरि-दरसन तें दूरि दुख, भयौ, गयो निज देस । गौतम-रिषि को नाउँ लै, कीन्हो नगर प्रवेश ॥७०॥ (सवैया) वैसई राज-समाज बने, गज-वाजि घने मन संभ्रम छायौ । वैसई कंचन के सब धाम हैं, द्वारिकै माहिं मनौँ फिरि आयौ ॥ भौन विलोकिबे को मन लोचत, सोचत ही सब गाँव मंझायो । पूछत पांडे फिरे सब सों, पर झोपरी को कहुँ खोज न पायौ ॥७१॥ सुदामा (कुण्डलिया) 'देव नगर कै अच्छपुर, हौं भटको कित आय ? नाम कहा यहि नगर को, सो न कहौ समुझाय ॥ सो न कहौ समुझाय, नगर-वासी तुम कैसे ? पथिक जहाँ संभ्रमहि, तहाँ के लोग अनैसे ॥ नगर०—'लोग अनैसे नाहिं, लखौ द्विज-देव नगर कै। कृपा करी हरि-देव, दियो है देव नगर कै ॥७२॥