सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
by महाकवि नरोत्तमदास
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Read in contextसुदामा-चरित / ५१ (कवित्त) सुन्दर महल मनि-मानिक जटित अति, सुबरन सूरज-प्रकाश मानौं दै रह्यौ। देखत सुदामाजू को नगर के लोग धाये, भेंटे अकुलाय जोई सोई पाँव छ्वै रह्यौ॥ बाँभनी के भूषन विविध विधि देखि कह्यौ, जैहौं हौं निकासौ सो तमासौ जग ज्वै रह्यौ। ऐसी दसा फिरि जब द्वारिका-दरस पायौ, द्वारिका तें सरस सुदामा पुर ह्वै रह्यौ॥७३॥ (दोहा) कनक-दंड कर मैं लिए, द्वारपाल है द्वार। जाय दिखायौ सबनि लै, 'या हैं महल तुम्हार'॥७४॥ कही सुदामा 'हँसत हौ, ह्वै करि परम प्रबीन। कुटी दिखावहु मोहि वह, जहाँ बाँभनी दीन'॥७५॥ द्वारपाल सों तिन कही, 'कहि पठवहु यह गाथ। आए बिप्र महाबली, देख होहु सनाथ'॥७६॥ सुनत चली आनन्दयुत, सब सखियन लै संग। नूपुर किंकिनि, दुंदभी, मनहुँ काम चतुरंग॥७७॥ कही बांभनी आयकै, यहै कंत निज-गेह। श्रीजदुपति तिहुँलोक मैं, कीन्हों प्रगट सनेह'॥७८॥ सुदामा हमें कंत तुम जनि कहौ, बोलो वचन सँभारि। इहैं कुटी मेरी हती, दीन बापुरी नारि॥७९॥ स्त्री मैं तो नारि तिहारियै, सुधि संभारिए कंत। प्रभुता सुन्दरता दई, अद्भुत श्री भगवंत॥८०॥