सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
by महाकवि नरोत्तमदास
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Read in contextसुदामा-चरित / ५३
करहिं चौर चहुँ ओर तें, रंभादिक सब नारि। पतिब्रता अति प्रेम सों, ठाढ़ी करै बयारि ॥८६॥ स्वेत-छत्र की छाँह मैं, राजत सक्र-समान। बाहन गज रथ तुरँग बर, अरु अनेक सुभजान ॥८७॥ कामधेनु सुरतरु सहित, दीन्हीं श्री बलबीर। जानि परी गुरुबंधु हरि, हरि लीन्हीं सब पीर ॥८८॥ बिबिध भाँति सेवा करी, सुधा पियायो बाम। अति बिनीत मृदु बचन कहि, 'सब पूरो मन काम' ॥८६॥ लै आयसु तिय न्हाइ कर सुचि सुगन्ध सब लाइ। पूजी गौरि सोहाग-हित प्रीति सहित सुख पाइ ॥ '०॥ षटरस चारि प्रकार के, भोजन रचे बनाय। कंचन-थार मँगायकै, ता मैं धर्यो रचाय ॥६१॥ चंदन चौकी डारिकै, दासी परम सुजानि। रतन जटिल भाजन-कनक, भरि गंगाजल आनि ॥६२॥ कूजा कंचन रतनयुत, सुचि सुगन्ध जल-पूरि। रच्छाधान समेत सो, जल-प्रकाश भर-पूरि ॥६३॥ रतन-जटित पीढ़ा-कनक, धर्यो जु बैठन काम। मरकत-मनि चौकी धरी, कछुक दूरि छवि-धाम ॥६४॥ चौकी लई मँगायकै, पग धोवन को पाथ। मनि-पादुका बिचित्र अति, धरि सलिल के साथ ॥६५॥ 'चलिए भोजन करन कों,' कह दासी मृदु भाखि'। उठे 'क्रुस्न' सानंद कहि, 'धन्य धन्य हरि साखि' ॥६६॥ बसन उतारे जायकै, धोवत चरन-सरोज। चौकी पै छबि देत यौं, जनु तनु धरे मनोज ॥६७॥ पहिरि पादुका बिप्र जब, पीढ़ा बैठे जाय। रति तें अतिछबि आगरी, पति सों हँसि मुसुकाय ॥६८॥