BharatKosha
सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

by महाकवि नरोत्तमदास

DevanagariHindipublished108 pages

Page 49 of 108

Read in context
Page 49

५४ / सुदामा-चरित विविध भाँति भोजन धरे, व्यंजन चारि-प्रकार। जोरि पछिओरी सकल, प्रथम कहे नहिं पार ॥६६॥ ‘हरिहिं समर्पौ कंत अब’ कहा मंद हँसि बाम। करि घंटा को नाद त्यों, हरि समर्पि लिय नाम ॥१००॥ अगिन जिमाय विधान सों, वैस्व देव करि नेम। बलि काढ़ी जेंवन लगे करति पवन तिय प्रेम ॥१०१॥ वार-वार पूछत यहै, ‘लीजै जो रुचि होय। कृस्न-कृपा पूरन सबै, अबै परोसौं सोय ॥१०२॥ जेइँ चुके अचवन लगे, करन गये विश्राम। रतन-जटित पालक कनक, देनो सुरेसम दाम ॥१०३॥ ललित बिछौना विरचिकै, पाँयत कसिकै डोरि। राखे वसन सुसेवकनि, रुचिर अतर सों बोरि ॥१०४॥ पानदान नेरे धर्यो, भरि बीरी छवि-धाम। चरन धोय पौढ़न लगे, करन हेत विश्राम ॥१०५॥ कोउ चँवर कोउ वीजना, कोउ सेवत पद चारु। अति विचित्र भूषन सजे, गजमोतिन के हारु ॥१०६॥ करि सिंगार पिय पै गई, पान खाति मुसकाति। ‘कहौ कथा सब आदि तें, किमि दीन्ही यह भाँति ॥१०७॥ कही कथा सब आदि तें, राह चले की पीर। सोवत जिमि ठाढ़े किये, नदी गोमती-तीर ॥१०८॥ गए द्वार जिहिं भाँति सों, सो सब करी बखान। ‘कहि न जाय मुख लाख सों, कृस्न मिले ज्यों आन ॥१०३॥ कर गहि भीतर लै गये, जहाँ सकल रनिवास। पग धोवन को आप ही, बैठे रमा निवास ॥११०॥ देखि चरन मेरे चल्यो, प्रभु नयनन तें नीर। ताहीं सों धोये चरन, देखि चकित नर-नारि’ ॥१११॥