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सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

by महाकवि नरोत्तमदास

DevanagariHindipublished108 pages

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सुदामा-चरित / ५६ विशेष—इस दोहे में कथावृत्त की मौलिक उद्भावना का संकेत मिलता है। श्रीमद्भागवत में सुदामा-पत्नी पहले से ही यह जानती है कि श्रीकृष्ण उसके पति के मित्र हैं, किन्तु नरोत्तमदास अपनी इस रचना में सुदामा के मुँह से इस रहस्य का उद्घाटन कराकर चमत्कार की सृष्टि करते हैं। उससे रचना में नाटकीयता का संचार होता है। (७) शब्दार्थ—हितू = हितैषी, मित्र। जदु-कुल-कैरव-चंद = यदुवंश रूपी रात्रि-कमल के लिए चाँद अर्थात् श्रीकृष्ण। जैसे चाँद को देखकर कुमुदनी का फूल खिल जाता है, उसी प्रकार यदुकुल श्रीकृष्ण को देखकर खिल जाता था। ते = वे। दारिद-संताप तें = निर्धनता के दुख से। किमि = क्यों, किसलिए। निर्द्वन्द्व—निश्चित। व्याख्या—सुदामा-पत्नी सुबुद्धि अपने पति को समझाती हुई कहती है कि जिनके मित्र द्वारिकापति श्रीकृष्ण के समान महादानी हों; वे निर्धनता के दुःख से निश्चित क्यों न रहें अर्थात् उन्हें दारिद्र्य रूपी अभिशाप से अवश्य ही छुट- कारा मिलना चाहिए और वे धन-वैभव को प्राप्त करें। विशेष—इस दोहे में सुदामा-पत्नी सुबुद्धि के बुद्धि-कौशल और रूपक अलंकार का सौष्ठव द्रष्टव्य है। (८) शब्दार्थ—वाम = स्त्री, पत्नी। वृथा = व्यर्थ। भोग = सांसारिक सुख। व्याख्या—सुदामा ने अपनी पत्नी के विचार से असहमत होते हुए कहा कि सांसारिक सुख-वैभव, विलास आदि व्यर्थ हैं। प्रभु का भजन ही सत्य है और धर्म का पालन करते हुए जप, योग आदि में ध्यान लगाना ही समीचीन है। विशेष—इसमें सुदामा की वैराग्य-भावना के साथ-साथ आत्मतुष्टि अलं- कार का सौन्दर्य देखा जा सकता है। (६) शब्दार्थ—लोचन = नेत्र, नयन। दुख-मोचन = दुख दूर करने वाले। भाल = माथा। पीत-वसन = पीले वस्त्र। वैजन्तीमाल = पाँच प्रकार के रत्नों से बनी माला, जिसे श्रीकृष्ण जी अपने गले में पहनते थे। संदीपनि = सुदामा