सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
by महाकवि नरोत्तमदास
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Read in context६० / सुदामा-चरित तथा श्रीकृष्ण के गुरु का नाम। व्याख्या—सुदामा की विरक्ति को देखकर उसकी पत्नी सुबुद्धि उसे उपदेश देती हुई कहने लगी कि संदीपन गुरु के पास जो श्रीकृष्ण आपके साथ पढ़े हैं और जिन्हें आप अपना बालसखा मानते हैं, वे सांसारिक व्यक्ति नहीं हैं। उसका तो यह विश्वास है कि कमल के समान नेत्र वाले, दुःखों को दूर करने वाले, माथे पर तिलक लगाने वाले, कानों में कुण्डल धारण करने वाले, मस्तक पर मुकुट पहने, पीले वस्त्रों को ओढ़े, गले में वैजयन्ती माला पहने, हाथ में शंख, चक्र, गदा तथा कमल को लिए जिस चतुर्भुज मूर्ति का सबने परमात्मा के रूप में उल्लेख किया है, श्रीकृष्ण वस्तुतः उन्हीं के अवतार हैं। वे ही आज द्वारिका- पुरी के स्वामी हैं। वे अनाथों के नाथ हैं, अतः यदि आप द्वारिकापुरी जायेंगे तो वे अवश्य ही हमारी निर्धनता को दूर कर देंगे। विशेष—इस कवित्त में श्रीकृष्ण के भव्य रूप-चित्रण तथा उनके अवतार होने की ओर संकेत किया गया है। वे विष्णु के अवतार हैं और अनाथों के नाथ होने के कारण उन्हें दीनबन्धु कहा जाता है। परिकर, उपमा आदि अलं- कारों के स्वाभाविक प्रयोग से इस छन्द के भाव-सौष्ठव में वृद्धि हुई है। (१०) शब्दार्थ—सिक्षक = शिक्षक। सिगरे = सारे। पद-पंकज = चरण- कमल। परिच्छा—परीक्षा। बावरि = पगली। भिच्छा = भिक्षा। व्याख्या—सुदामा अपनी पत्नी का उपदेश सुनकर चिढ़ गये, उनका ज्ञानी रूप प्रबल हो उठा और वे अपनी पत्नी को समझाते हुए कहने लगे कि हे ब्राह्मणी ! जो सुदामा सारे संसार को उपदेश देता है, उसे वह क्या शिक्षा दे रही है। जो व्यक्ति तपस्या करके स्वर्ग प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें धन-वैभव की कोई इच्छा नहीं होती है। वह तो हरि-भक्त है। उसे धन-दौलत की आकाँक्षा नहीं है। उसके हृदय में तो श्रीकृष्ण के चरण-कमल की चाह है, वह हजारों बार उसकी परीक्षा लेकर देख सकती है। धन-वैभव अन्य व्यक्तियों को चाहिए; ब्राह्मण का धन तो केवल भिक्षा ही है, उसी से वह अपना निर्वाह करता है। सुदामा ब्राह्मण है, सामान्य गृहस्थी नहीं। फलतः उसे धन का लोभ नहीं है। विशेष—इस सवैया छन्द में एक आदर्श ब्राह्मण की जीवन-दृष्टि पर प्रकाश