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सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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पृष्ठ 56

सुदामा-चरित / ६१

डाला गया है। आदर्श ब्राह्मण धन-वैभव को नहीं वरन् प्रभु-भजन को ही अपना जीवन-लक्ष्य बनाता है। सुदामा इसी जीवन-दर्शन का प्रबल समर्थक था। (११) शब्दार्थ — तिहुँलोकन = तीनों लोक = स्वर्ग, मर्त्य और पाताल । सिद्ध करो = जाओ, प्रस्थान करो (यह ब्रज का एक प्रचलित मुहावरा है।) मति = मति, राय । दीन ह्वै बोलै = दीन भाव से बोलते हुए । पन = अवस्था । कन = अन्न के दाने, भीख । सो तिहुँपन क्यों कन माँगत डोले = वह तीसरी अवस्था अर्थात् बुढ़ापे में भी क्यों भिक्षा माँगता फिरे । व्याख्या — सुदामा के सबल तर्क को सुनकर भी उसकी पत्नी सुबुद्धि सन्तुष्ट न हुई और अपनी धारणा को पुष्ट करती हुई कहने लगी कि द्वारिकापति श्री- कृष्ण तीनों लोकों के महादानी हैं। संसार उनका नाम स्मरण करके ही जीवित है। वे दीनबन्धु हैं। हे नाथ ! मेरे विचार से आप शीघ्र ही द्वारिका के लिए प्रस्थान कीजिए। जो प्रभु के द्वार पर जाकर अपने दुःखों के निवारण की प्रार्थना नहीं करते हैं, उन्हें साधारण लोगों के द्वार पर जाकर, दीन बनकर भिक्षा मांगनी पड़ती है। भगवान् श्रीकृष्ण जिनके मित्र हों, वह भला क्यों इस बुढ़ापे में द्वार- द्वार भीख माँगता फिरे ? अर्थात् आपको द्वार-द्वार भीख नहीं माँगनी चाहिए। श्रीकृष्ण से सहायता लेने में आपको संकोच करने की आवश्यकता नहीं है। विशेष — इस छन्द में सुबुद्धि के तर्क उसके बुद्धि-कौशल को प्रदर्शित करते हैं। ऐसे ही तर्कों से वह अपने लक्ष्य में सफलता प्राप्त करती है। (१२) शब्दार्थ — छत्रिन = क्षत्रिय । पन = प्रण, प्रतिज्ञा, कर्त्तव्य । जुद्ध = युद्ध, लड़ाई। जुवा = युवा । बाजि = घोड़े । वैंसे = वैश्य, व्यापारी वर्ग । सेवन- साजन = सेवा करना । कै = अथवा, या । व्याख्या — सुदामा अपनी पत्नी के तर्क को काटते हुए कहने लगे कि क्षत्रियों का धर्म सेना (हाथी, घोड़े आदि) को सजाकर युद्ध करना है। वैश्यों का व्यव- साय, व्यापार एवं खेती करना है। शूद्रों का काम सेवा करना है। ब्राह्मणों का धर्म पढ़ना और तप करना है। उन्हें सुख-सम्पत्ति की चाह नहीं रहती। वे जीवन-निर्वाह के लिए भिक्षा माँगते हैं; उन्हें भिक्षा माँगने में किसी प्रकार की लज्जा नहीं करनी चाहिए ।

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