सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
by महाकवि नरोत्तमदास
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Read in context६२ / सुदामा-चरित विशेष—इस छन्द में सुदामा द्वारा समाज के चारों वर्गों के धर्म की व्याख्या की गई है। उसी के अनुसार सुदामा भिक्षा माँगकर निर्वाह करने में अपना अप- मान नहीं समझता है। (१३) शब्दार्थ—कोदो-सवाँ—एक तरह का सस्ता और मोटा अन्न । जुरतो = मिलता। मिठौती = मिठाई। सीत बितीत = सर्दियाँ कटती हैं, गुजरती हैं। हौं = मैं। हठती = हठ करके रहती। पै तुम्हें न हठौती = तुम्हें ठेल कर नहीं भेजती। पेलि पठौती = ठेल कर भेजती। व्याख्या—सुदामा की आदर्शवादिता से कुछ अधीर होकर उसकी पत्नी कहने लगी कि उसे दूध, दही एवं मिठाई की चाह नहीं है। उसे तो जीवित रहने के लिए यदि कोदो-सवाँ जैसे मोटे अनाज और जाड़े में मोटे वस्त्र ही मिल जाते तो वह दृढ़तापूर्वक रहती और आपसे द्वारिकापुरी जाने के लिए हठ न करती। पर यहाँ तो स्थिति बड़ी विकट है, कभी पेट भर अन्न नहीं मिला है और जाड़ा सिसियाते ही व्यतीत हुआ है। घर में दरिद्रता का ऐसा साम्राज्य छाया हुआ है कि रोटी बनाने के लिए समुचित तवा और कठौती तक नहीं है। उसे यदि यह पता न चलता कि द्वारिकापति श्रीकृष्ण जैसे महादानी आपके बाल-सखा तथा सहपाठी हैं तो वह कभी भी आपको द्वारिका जाने के लिए बाध्य न करती। विशेष—सुदामा के घोर दारिद्र्य को व्यंजित करने के लिए यह छन्द, विशेषतः इसके ये शब्द—'टूटो तवा अरु फूटी कठौती' अत्यन्त मार्मिक हैं। इससे सुदामा के घर की दयनीय स्थिति एक चित्र प्रस्तुत हो जाता है। (१४) शब्दार्थ—जक ठानी = किसी बात की बार-बार रट लगाना। वक = बकवाद। जाम = पहर। दैहैं लदाय = भर देंगे। लढ़ा = बैलगाड़ी। अटारी अटा = कोठी, भव्य भवन। छानी = छप्पर। जौ पै = यदि। काहू पै = किसी से भी। अजानी = भोली, अनजान, अज्ञात। व्याख्या—भाग्यवादी सुदामा अपनी पत्नी को समझाते हुए कहने लगे कि तुम्हें तो बस सब कुछ छोड़कर दिन-रात अपनी निर्धनता की ही चिंता लगी रहती है। क्या वह यह समझती है कि उसके (सुदामा के) द्वारिकापुरी पहुँचते ही श्रीकृष्ण उसे गाड़ियाँ भर-भर कर धन-वैभव दे देंगे। क्या उसे इस बात का