सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
by आचार्य चतुरसेन शास्त्री
Source: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (origin)
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Read in contextहमारे रहने का घर
यह शहर ही हमारे रहने का घर है। इस घर को स्वयं ईश्वर ने बनाया है, इसकी कारीगरी अद्भुत है, इसमें निरालापन यह है कि यह घर हमारे साथ-साथ चलता-फिरता है और हम इसमें से बाहर नहीं आ-जा सकते। यह दुनिया के सब घरों से छोटा है। यह दुर्गजिला है और उसके ऊपर एक गुम्बज है। फिर भी उसकी सारी ऊँचाई सिर्फ चार हाथ ही है। इस घर में एक मजोदार विशेषता यह भी है कि जैसे और घरों में कई आदमी रह सकते हैं इसमें कोई नहीं रह सकता, सिर्फ मैं ही रह सकता हूँ। यह घर दूसरे के हाथों नहीं ब्रेचा जा सकता, न दूसरे के काम आ सकता है। जब हम उसमें से निकल जाते हैं तो वह गिर पड़ता है। और तब लोग या तो उसे जला देते हैं या धरती में गाड़ देते हैं।
इस घर की दो खिड़कियाँ हैं, जो मुवह धोकर साफ की जाती हैं। रात को किवाड़ बन्द कर लिये जाते हैं उनमें कोई चटखनी नहीं है। घर के सामने एक दर्वाजा है और दो दर्वाजे अगल-बगल