स्वरोदय विज्ञान
Swarodaya Vigyan
by श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर)
Source: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (origin)
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(स्वरोदय विज्ञान)
सब योगन को योग है, सब ज्ञानन को ज्ञान।
सर्व सिद्धि की सिद्धि हैं, तत्त्व सुरन कौ ध्यान।।
इस विद्या को जानने वाले तीनों काल का हाल बता सकते हैं, जो इस विद्या से खूब परिचित हैं वे अपनी मृत्यु अथवा बीमारी का हाल पहले ही मालूम कर लेते हैं। इसके अनुसार जो कार्य किया जाता है वह कभी विफल नहीं होता :-
धरनि टरै गिरिवर टरै, टरै जगत सुन भीत।
वचन स्वरोदय ना टरै, कह मुरली सुत रणजीत।
स्वरों का वर्णन
स्वर तीन हैं— दाहिना (पिङ्गल स्वर), बायां (इडा स्वर) और सुषुम्णा। इडा, पिङ्गला, सुषुम्णा—तीन नाडियों और इन्हीं के नाम से तीन प्रकार के स्वर प्रसिद्ध हैं। इडा शरीर के बायीं और फँली हुई है इसे चन्द्र—नाडी कहते हैं। पिङ्गला शरीर के दाई ओर है, इसे सूर्य नाडी कहते हैं, सुषुम्णा नाडी शरीर के बीचों—बीच है। सूर्य—चक्र इसी के आधार पर स्थित है।
श्वास कभी दाहिनी नथने से ज्यादा जोर से निकलता है, कभी बायें से, कभी दोनों नासिकाओं में बराबर निकलता है। यदि स्वर बायीं नासिका से ज्यादा आवे तो उसे इडा स्वर या चन्द्र स्वर कहते हैं। यदि श्वास दाहिनी नासिका से अधिक आवे तो उसे पिङ्गला या सूर्य स्वर कहते हैं। यदि श्वास दोनों नासिकाओं से बराबर निकलता है तो उसे सुषुम्णा स्वर कहते हैं।
इडा पिङ्गला सुषुम्णा—नाडी तीन विचार।
दाहिने बायें स्वर चले—लखें धारना धार।
इस विद्या में चन्द्रमा को अधिष्ठात्री माना गया है। सब प्रकार की