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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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स्वप्नस्मृतिप्रकरणम् ७५ मूषासिक्तं यथा ताम्रं तन्निभं जायते तथा । रूपादीन् व्याप्नुवच्चित्तं तन्निभं दृश्यते ध्रुवम् ॥३॥ मूषेति—जैसे ताम्र [ताँबा] साँचे में डालने पर तदाकार हो जाता है, वैसे ही रूपादि को व्याप्त करने वाला चित्त निश्चय ही तद्रूप [तदाकार] होता है ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी सभी अवस्थाओं में बुद्धि ही अर्थ (पदार्थ-वस्तु) के आकारवाली दिखाई देती है, जैसे आग में तपाकर द्रवीभूत किये ताँबे को मूषा (अन्तःसुषिरा मृत्प्रतिमा) अर्थात् साँचे में डालनेपर तत्समानाकार हो जाता है, वैसे ही यह चित्त (बुद्धि) भी रूप आदि विषयों को व्याप्त कर तदाकार (तद्रूपाकार) हो जाता है ॥ ३ ॥ व्यञ्जको वा यथाऽऽलोको व्यङ्ग्यस्याकारतामियात् । सर्वार्थव्यञ्जकत्वाद्धीरर्थाकारा प्रदृश्यते ॥४॥ व्यञ्जको वेति—अथवा जैसे पदार्थ को व्यक्त करने वाला प्रकाश अपने प्रकाश्य के आकार का हो जाता है, वैसे ही सम्पूर्ण वस्तुओं को अभिव्यक्त करनेवाली होने के कारण बुद्धि भी तत्तद् वस्तु के आकारवाली होती देखी जाती है ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी साँचे (मूषा) में डाला हुआ तरल ताम्र, कठोर साँचे के अभिघात से शीतल होनेपर उसका साँचे के आकार में परिणत होना तो समझ में आता है, किन्तु चित्त तो अमूर्त है, वह तत्तद् वस्तुओं में व्याप्त होनेपर भी उसका वस्तु के आकार में परिणत होना कैसे संभव हो सकता है ? इस शंका के समाधानार्थ दूसरा दृष्टान्त देते हैं। जैसे अयःपिण्ड (लोहे के गोले) का अभिव्यञ्जक अग्नि तदाकार (गोले के आकार) में परिणत हो जाता है अथवा प्रकाश घट आदि के आकार का हो जाता है, वैसे ही घट-पटादि को प्रकाशित करनेवाली बुद्धि भी घट-पट के आकार वाली हो जाती है ॥ ४ ॥ धीरेवार्थस्वरूपा हि पुंसा दृष्टा पुराऽपि च । न चेत्स्वप्ने कथं पश्येत्स्मरतो वाऽऽकृतिः कुतः ॥५॥ धीरेवेति—स्वप्न और स्मृति के पूर्व भी पुरुष ने वस्तु के आकार में ही बुद्धि को देखा है, अन्यथा स्वप्न में वह संकल्पमय पदार्थों को कैसे देख पाता ? और उन पदार्थों की स्मृति होते ही उन पदार्थों की सृष्टि [ रचना ] कैसे होती ? ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी अन्वय के द्वारा बुद्धि की प्रत्यक्षता प्रथम श्लोक में बताई थी । विषयाकार हुई बुद्धि का ही जाग्रदवस्था में अनुभव किया था, उसी कारण स्वप्न और स्मृति में वह बुद्धि, अर्थ के आकार में उपस्थित होती है। इसी अभिप्राय को प्रस्तुत पद्य से व्यतिरेक के द्वारा स्पष्ट कर रहे हैं—जाग्रदवस्था में बुद्धि को यदि अर्थाकार न देखा होता तो स्वप्न में या स्मृति में वह कैसे दिखाई देती ? क्योंकि स्वप्न और स्मृति में बुद्धि के व्यतिरिक्त अन्य कोई पदार्थ नहीं रहता, और जो न देखा हो, उसका कभी स्फुरण नहीं होता । अर्थात् पूर्वानुभव के समय अर्थाकारा बुद्धि का अनुभव न हुआ होता तो स्मरण के समय स्मृति का कोई आकार ही न बन पाता, क्योंकि उस समय बुद्धि के अतिरिक्त आकार प्रदान करनेवाला कोई पदार्थ नहीं है। कदाचित् वह बुद्धि में आरूढ़ भी हो तथापि उसके अनुभूत न रहने के कारण उसमें आकारप्रदत्व नहीं रहता । तस्मात् जाग्रदवस्था और पूर्वकालिक अनुभव में विषयाकार हुई बुद्धि की प्रत्यक्षता सिद्ध है ॥ ५ ॥