उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in context७६ उपदेशसाहस्री व्यञ्जकत्वं तदेवाश्या रूपाद्याकारदृश्यता । द्रष्टृत्वं च दृशेस्तद्द्व्याप्तिः स्याद्धिय उद्भवे ॥६॥ व्यञ्जकत्वमिति-रूप आदि के आकार में परिणत हुई बुद्धि, दर्शन के योग्य हो पाती है। उस योग्य बन पाना ही उसका [बुद्धि का] विषय-प्रकाशकत्व है, अर्थात् विषय को प्रकाशित करना है। उसी प्रकार साक्षी आत्मा के द्वारा उस उदित हुई बुद्धि को व्याप्त करना ही उसका [आत्मा का] द्रष्टृत्व है ॥ ६ ॥ हृदयस्पर्शिनी चतुर्थ श्लोक में कहा था कि अभिव्यंजक होने से आलोक के समान बुद्धि भी अर्थाकार होती है। किन्तु वह उचित प्रतीत नहीं हो रहा है। अर्थाकारता का ग्रहण किये बिना भी आलोक स्वच्छ स्वभाव का होने से उसमें तो व्यंजकता संभव हो सकती है, किन्तु बुद्धि में वैसी व्यंजकता कैसे संभव हो सकती है ? इस शंका का समाधान यह होगा कि इस बुद्धि की रूपादि आकार से जो दृश्यता अर्थात् दर्शनयोग्यता है, वही तो उस बुद्धि की विषयव्यंजकता है। विषय का अवभास होना ही चैतन्य है। और बुद्धि के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी विषय स्वतंत्ररूप से स्फुरित नहीं होता। एवंच बुद्धि को यदि विषयाकार न मानें तो चैतन्य की विषयरूप से स्फूर्ति नहीं हो सकती। अतः विषय की अभिव्यक्ति के लिये उसका विषयाकार होना ही बुद्धि का व्यंजकत्व है। जैसे रूपादि के आकार में अवभासमान होना ही बुद्धि का रूपादिव्यंजकत्व है, वैसे ही धर्माधर्मवशात् बुद्धि की उत्पत्ति होने पर तद्व्याप्ति अर्थात् बुद्धि के आकार में स्फुरण होना ही आत्मा का द्रष्टृत्व है, वह परिणाम नहीं है। यद्यपि बुद्धि का विषय में व्याप्त होना परिणाम के बिना नहीं हो सकता, क्योंकि विषयदेश में वह बुद्धि पहले से ही अविद्यमान है। तथापि बुद्धिवृत्ति में चैतन्य आत्मा के व्याप्त होनेपर उसमें परिणाम की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि चिदात्मा में ही उसके प्रकाश से प्रकाशित हुई बुद्धि ही सर्वदा विद्यमान रहती है। अभिप्राय यह है कि चेतन के द्वारा बुद्धि को दृश्य मानने पर द्रष्टा चेतन में परिणामित्व की शंका करना उचित नहीं है। जैसे विषयाकार में बुद्धि के दृश्यत्व को ही व्यंजकत्व कहते हैं, वैसे ही धर्माधर्मवशात् बुद्धि- वृत्तियों के उत्पन्न होनेपर चिदात्मा के सन्निधिमात्र से व्याप्ति अर्थात् उसका साक्षित्व, दृशि आत्मा का द्रष्टृत्व समझना चाहिए, उसमें परिणामित्व नहीं है। निष्कर्ष यह है कि जब पानी उद्यान की क्यारियों में जाता है, तो उन क्यारियों के आकार का ही हो जाता है। वैसे ही यह अन्तःकरण (बुद्धि) की वृत्ति, इन्द्रिय के माध्यम से जब विषयदेश में जाती है और विषय को व्याप्त कर लेती है, तब वह विषय के आकार में ही परिणत हो जाती है। विषयाकार में परिणत हुई बुद्धि को कूटस्थ आत्मचैतन्य प्रकाशित करता है, बुद्धि परिच्छिन्न है। वह विषयदेश में विद्यमान नहीं होती, इसलिए विषय को व्याप्त करने से वह विषयाकार हो जाती है, किन्तु आत्मा विभु और निर्विकार है। वह बुद्धि और विषयदेश में समानरूप से विद्यमान है। अतः उसमें कोई परिणाम नहीं होता। विषय का स्फुरण बुद्धि के परिणाम के अधीन है, किन्तु विषयज्ञान का स्फुरण आत्मचैतन्य से ही होता हैं। विषयज्ञान ही विषयाकारा बुद्धि है। अतः वह आत्मा की दृश्य है और आत्मा उसका साक्षी यानी द्रष्टा है ॥ ६ ॥ चिन्मात्रज्योतिषा सर्वाः सर्वदेहेषु बुद्धयः । - मया यस्मात्प्रकाश्यन्ते सर्वस्यात्मा ततो ह्यहम् ॥७॥ चिन्मात्रेति -- क्योंकि समस्त देहों (शरीरों) में समस्त बुद्धियाँ चिन्मात्र-ज्योतिःस्वरूप मेरे ही द्वारा प्रकाशित होती हैं, अतः मैं सभी का आत्मा (स्वरूप) हूँ ॥ ७ ॥ हृदयस्पर्शिनी बुद्धि और उसकी वृत्तियों का साक्षी होने से चिदात्मा में परिणाम न होनेपर भी ब्रह्मरूपता के कारण उसे एक समझना उचित नहीं है। क्योंकि प्रत्येक शरीर में तत्तद् बुद्धियों के तत्तत् साक्षी भी रहेंगे। अतः चिदात्मा को एक कहना ठीक नहीं है - इस शङ्का का समाधान इस प्रकार करते हैं कि शंकाकार के कथन में कोई प्रमाण नहीं है। जैसे एक शरीर में बुद्धि का जो अवभास है, वह अविकृत चिद्व्याप्तिमात्र है। वैसे ही सर्वशरीरगत बुद्धियों का अव- भास भी है। एवंच भास्यबुद्धि का भेद रहने पर भी, उनमें अवभासत्वधर्म (रूप) है, वह एक ही है, उसका भेद नहीं