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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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( ४ ) ६. वस्तुमात्र में कारणता और कार्यता का निरसन ... ... २१-२४ ७. द्वैत के आभास का निरूपण और मंगलाचरण ... ... २५-२८ गद्यभागः १. शिष्यानुशासनप्रकरणम् (पृ० २७३-२९८) वाक्य संख्या १. चिकीर्षित प्रतिज्ञा का उल्लेख करते हुए शास्त्रीय अनुबन्धों का संग्रह ... ... १ २. संक्षेप से उक्त अर्थ का स्पष्टीकरण ... ... २ ३. गुरु के समीप जाने की आवश्यकता ... ... ३ ४. गुरु के द्वारा बार-बार उपदेश दिये जाने का कारण ... ... ४ ५. ज्ञानोत्पत्ति के होने में अनेक हेतुओं का होना ... ... ५ ६. गुरु के द्वारा किये जाने वाले उपदेश का क्रम ... ... ६ ७. श्रुति तथा स्मृतिपठित वाक्यों के द्वारा ब्रह्म के लक्षण का ज्ञान, शिष्य को करावे ... ... ७-८ ८. शिष्य की बुद्धि (ज्ञान) को सुदृढ बनाने के लिये उसे गुरु पुनः प्रश्न करे ... ... ९ ९. शिष्य के उत्तर को सुनकर उसे यथार्थज्ञान न हो पाने का गुरु को बोध होना ... ... १० १०. यथार्थज्ञानोत्पत्ति में प्रतिबन्धक दोषों के निवारणार्थ शिष्य को आचार्य के द्वारा पुनः उपदेश ... ... ११ ११. आत्मा और अनात्मा में विवेक (भेद) और 'क्रम' शब्द से 'एक भविकल्यवाद' का निरास ... ... १२ १२. शिष्य के मुख से उसे अवगत हुए विवेक को सुनकर गुरु के द्वारा प्रशंसा किया जाना ... ... १३ १३. भ्रान्ति के होने में वर्णाश्रमादि के प्रति अभिमान होना ही मूल कारण है ... ... १४-१५ १४. उक्त अर्थ को ही अधिक स्पष्ट करते हुए परमात्मा के लक्षण का अनुसन्धान कराना ... ... १६-१७ १५. शरीर की भिन्न जाति, कुल, संस्कार को बोधित करने के लिए संघात की उत्पत्ति का प्रकार और ब्रह्म की अभिन्ननिमित्तोपादानता का निरूपण ... ... १८ १६. नाम और रूप की व्याकृति ... ... १९ १७. शरीर की उत्पत्ति का प्रकार ... ... २० १८. शरीर की भिन्न जाति, अन्वय और संस्कार का निरूपण ... ... २१ १९. मन आदि सूक्ष्म संघात भी आत्मा नहीं है ... ... २२ २०. स्रष्टा का ही जीवरूप में प्रवेश और परमात्मा ही क्षेत्रज्ञ है ... ... २३-२४ २१. अनुभवविरोधशंकासमाधानपूर्वक भेददृष्टि की निन्दा ... ... २५-२७ २२. ब्रह्मात्मैक्य के ज्ञान से कर्म और उसके साधन का निषेध ... ... २८-३२ २३. युक्ति से ब्रह्मात्मैक्य का व्यवस्थापन ... ... ३२-३५ २४. वेदादि में अनात्मत्व का उपपादन ... ... ३५ २५. रूपादि संस्कारों में बुद्ध्याश्रयता ... ... ३६ २६. ब्रह्म और आत्मा की एकता में श्रुतिस्मृति के प्रमाणों का प्रतिपादन ... ... ३७-३८ २७. ब्रह्म और आत्मा की एकता में लौकिक-वैदिक व्यवहार की आशंका और परिहार ... ... ३९-४० २८. कर्मकाण्ड के अप्रामाण्य की आशंका और उसका परिहार ... ... ४१-४२ २९. अविद्या के उन्मूलन का फल ... ... ४३ ३०. मोक्ष में कर्म की साधनता न होने का निरूपण ... ... ४४