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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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( vi ) २. कूटस्थाऽद्वयात्मबोधप्रकरणम् (पृ० २१९-३२४) १. संसार विषयक प्रश्न ... .... ४५ २. दुःख का अनुभव नैमित्तिक है .... .... ४६ ३. उसका निमित्त अविद्या है .... ... ४७-४८ ४. अविद्याविषयक प्रश्न ... ... ४९ ५. अविद्या चिन्मात्राश्रयविषयक है ... ... ५० ६. अध्यास की अनुपपत्ति बताते हुए शिष्य का प्रश्न ... ... ५१ ७. प्रसिद्ध का प्रसिद्ध में ही अध्यारोप होने का कोई नियम नहीं है ... ... ५२ ८. आक्षेप-समाधान पूर्वक अध्यारोप की सिद्धि .... ... ५३-५४ ९. इतर का इतर में अध्यास होने से आत्मा के असत्त्व-प्रसंग की शंका .... ... ५५ १०. गुरु का उत्तर .... ... ५६ ११. वैनाशिक पक्ष की प्राप्ति की आशंका और उसका परिहार ... ... ५७-५८ १२. परमत में दूषण का आपादन ... ... ५९ १३. प्रकारान्तर के अध्यास की अनुपपत्ति की आशंका और उसका परिहार .... ... ६०-७३ १४. आत्मा स्वतन्त्र है अथवा परतन्त्र ? ... ... ६६-७० १५. चितिमान् परतन्त्र नहीं रहता ... .... ७१ १६. एक चितिमान् दूसरे चितिमान् के लिये नहीं है .... ... ७२-७३ १७. कूटस्थ के विषय में संशय एवं उसका परिहार .... .... ७४-७५ १८. उपलब्धा के रूप में कूटस्थत्व के अनुपपत्ति की आशंका और उसका परिहार .... ... ७६-८५ १९. उपाधि के कारण उपलब्धि में फल का उपचार ... ... ७७ २०. बुद्धि और उसके धर्माध्यास के द्वारा आत्मा का संसारित्व .... .... ८१ २१. तीन अवस्थाओं का आगंतुकत्व .. .... ८६-८९ २२. चैतन्य आगंतुक नहीं है ... .... ९०-९१ २३. आत्मा का नित्यत्व, प्रकाश, कूटस्थचिद्रूपता ... ... ९२-९३ २४. संविद् में नित्यत्व का आक्षेप और परिहार .... .... ९४-१०१ २५. प्रमाता की स्वतःसिद्धि निरपेक्ष ही होती है .... ... ९९ २६. आत्मा में प्रकाशगुण की उत्पत्ति के अभाव का निश्चय ... .... १००-१०१ २७. आत्मा में प्रमातृत्व आदि का व्यवस्थापन .... ... १०२-१०३ २८. आत्मा में कर्तृत्व का प्रतिभास उपाधि के अविवेक के कारण हो होता है ... ... १०४-१०७ २९. ज्ञान में फलत्व की प्रसिद्धि उपचार के कारण होती है ... ... १०८ ३०. द्वैत के मृषात्व का निरूपण ... .... १०९-१११ ३. परिसंख्यानप्रकरणम् (पृ० ३२५-३२८) १. उपस्कार के सहित परिसंख्यान के प्रकार का उपदेश .... ११२-११३ २. शब्द आदि के द्वारा आत्मा के अभिभवराहित्य का विचार .... ... ११४-११५ ३. शब्द आदि से होनेवाले अनुभव तथा आत्मा की अविकारिता का अनुचिंतन .... ... ११६