उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
Page 114 of 364
Read in context८८ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी आत्मा तो सर्वदा चिन्मात्र ज्योतिःस्वरूप है, अतः वह गुण आदि से रहित है। क्योंकि गुण आदि की सत्ता तो अविद्या के होने से होती है। और गुण आदि के कारणीभूत अज्ञान की स्थिति आत्मवित् में कभी नहीं रहती। क्योंकि वह तो चिन्मात्र है। नित्यमुक्त आत्मा में अज्ञान रूप उपाधि के बिना किसी भी प्रकार के विशेष की कल्पना करना शक्य नहीं है। अज्ञान को ज्ञानस्वभाव कहना तो वस्तुतः असंभव ही है। अतः आत्मा में क्रिया- योग्यता तो कदापि नहीं बन सकती। इतना स्थित होने पर अब यह प्रश्न उपस्थित होता है कि जब अज्ञान का भी प्रतिभास नहीं है तब उसमें कर्मविधिशेषता कैसे हो सकेगी ? आत्मा में स्वरूपतः, प्रतिभासतः भी तम (अज्ञान) नहीं है, क्योंकि वह तो चिन्मात्र ज्योतिःस्वरूप है ॥ ३७ ॥ अमनस्कस्य का चिन्ता क्रिया वाऽनिन्द्रियस्य का । 'अप्राणो ह्यमनाः शुभ्र' इति सत्यं श्रुतेर्वचः ॥३८॥ अमनस्कस्येति-जो अमनस्क (मनोहीन) है, उसे चिन्ता कैसे हो सकती है? और जो अनिन्द्रिय (इन्द्रिय- रहित) है, वह किसी भी क्रिया को कैसे कर सकता है ? उसके विषय में भगवती श्रुति का वचन यथार्थ ही है-‘आत्मा, प्राणहीन, मनोहीन एवं शुद्ध है।' अतएव वह सर्वचिन्तारहित और निष्क्रिय है ॥ ३८ ॥ हृदयस्पर्शिनी किञ्च आत्मज्ञानी का अज्ञान के साथ और उसके कार्यभूत मन और चक्षुरादि के साथ सम्बन्ध न होने से उभयविध (बाह्याभ्यन्तर) क्रिया का अभाव है। अर्थात् जो मनोहीन होगा, उसे चिन्ता कैसे होगी ? और जिसे इन्द्रियाँ नहीं होंगी, वह क्रिया कैसे कर सकेगा ? एवञ्च उसमें क्रियाशेषता नहीं है। आत्मा के मन, प्राण आदि के न होने में प्रमाण यह है 'अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः' १-आत्मा प्राणहीन, मनोहीन, एवं शुद्ध है- श्रुति वचन का अर्थ सत्य समझना चाहिये, वह कभी असत्य नहीं हुआ करता। और वह निर्दोष होने के कारण स्वतः प्रमाण रहता है। अतः आत्मवित् सर्वदा चिन्तारहित और क्रियारहित होता है ॥ ३८ ॥ अकालत्वाददेशत्वादादिक्त्वादनिमित्ततः । आत्मनो नैव कालाद्यपेक्षा ध्यायतः सदा ॥३९॥ अकालत्वादिति-‘आत्मा' काल, देश, दिक् से रहित है, और र्नािनमित्त है। अतः उसका ध्यान करने- वाले के लिये सर्वदा ही (कभी भी) काल आदि की अपेक्षा नहीं है ॥ ३९ ॥ हृदयस्पर्शिनी किञ्च पुनः एक प्रश्न मन में उठता है कि आत्मचिन्तन के लिये अपररात्र्यादि काल, विविक्त पूतादि देश, प्राच्यादि दिग्विdefault/विशेष, मनोविक्षेपराहित्य, राहूपरागादि निमित्त की प्रतीक्षा तो करनी ही होगी, तब उसे क्रियारहित कैसे कह सकते हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में यह कहा जा रहा है कि सर्वदा आत्मचिन्तन करने वाले यति के लिये काल, देश आदि की कोई अपेक्षा नहीं होती। अर्थात् जिस प्रकार धर्म का अनुष्ठान करने के लिये पूर्वाह्नादि काल, तीर्थस्थानादि पवित्र देश, पूर्वादि दिशा तथा सूर्यग्रहणादि निमित्त की आवश्यकता रहती है, वैसी आत्मचिन्तन के लिये किसी नियम की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि आत्मा तो काल, देश, दिशा, निमित्त आदि किसी भी उपाधि से परिच्छिन्न नहीं है। एवञ्च आत्मस्वरूप के कालादि में से कोई निबन्धन न होने से उसके ध्यान करने में भी काल आदि की अपेक्षा नहीं होती। उस कारण चलते, फिरते, कहीं भी और किसी भी समय आत्मस्वरूप का चिन्तन (निदिध्यासन) किया जा सकता है। तस्मात् आत्मवित् में क्रियाशेषता नहीं है। भगवान् सूत्रकार ने भी ‘यत्रैकाग्रता तत्राविशेषात्' २ सूत्र से यही कहा है ॥ ३९ ॥ १. (मुं. उ. २।१।२) २. (ब्र. सू. ४।१।११)