उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in contextस्वप्नस्मृतिप्रकरणम् ८९ यस्मिन्देवाश्च वेदाश्च पवित्रं कृत्स्नमेकताम् । व्रजेन्मानसं तीर्थं यस्मिन्स्नात्वाऽमृतो भवेत् ॥४०॥ यस्मिन्निति—समस्त देवगण, वेद और सर्वदा पवित्र (शुद्ध) हरि-हरनामोच्चारणादि, जहां एकत्व को प्राप्त हो जाते हैं, उस मानसतीर्थ में मुमुक्षु को जाना चाहिये, जिसमें स्नान करने से मनुष्य अमर हो जाता है ॥ ४० ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मवित् (ब्रह्मवित्) को देश-काल आदि की अपेक्षा रखने वाले कर्म की अपेक्षा न रहने पर भी ‘गङ्गातीरे वसेन्नित्यं भिक्षुर्मोक्षपरायणः’—इस स्मृतिवचन के अनुसार उसे प्रयागादि तीर्थ की तो अपेक्षा रहती ही है, क्योंकि प्रयागादि तीर्थ को मुक्ति में हेतु कहा है । अतः ब्रह्मविद् को सर्वविध अपेक्षारहित कैसे कहा जायगा ? ऐसी आशंका होने पर कहा गया है कि मुक्ति के साक्षात् कारणभूत ब्रह्मात्मज्ञानरूप तीर्थ में जिसने स्नान कर लिया है, उस आत्मज्ञानी के लिये अन्य तीर्थ की अपेक्षा नहीं है । तात्पर्य यह है—सभी तीर्थस्थानों के अधिष्ठाता माधव, विश्वेश्वर, रामेश्वर, त्रिविक्रम आदि देवगण, जो अपनी पूजा, तथा दर्शन, स्पर्शन, स्मरण आदि से भक्तों को पावन करते हैं, तथा ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, जो अपने अध्ययन, ब्रह्मयज्ञपाठ, अनुष्ठान आदि से अनुष्ठाताओं को पवित्र करते हैं तथा सम्पूर्ण पवित्र तीर्थविशेष हरि-हर नामोच्चारण आदि, ब्रह्मात्मस्फुरण होने वाले आत्मज्ञानी में सागर में नदियों के समान ये सब एक हो जाते हैं, क्योंकि सर्वात्मब्रह्माविर्भाव रूप ही वह हो जाता है, सब के एक होने में यही एक परम हेतु है । उस आत्मवित् के अन्तःकरण की वेदान्तमहावाक्यजनित जो ब्रह्माकार वृत्ति है, वह संसाररूप महापाप की मूलभूत अविद्या की उच्छेदिका होने से तीर्थस्वरूप है। उस ब्रह्माकार वृत्तिरूप तीर्थ में अवगाहन कर जलराशि में निक्षिप्त जलबिन्दु के समान एकता को प्राप्त होकर निर्विशेष नित्यात्मस्वरूप ही वह हो जाता है । उस तीर्थ में नित्य निमग्न रहने वाले को किसी अन्य तीर्थान्तर की अपेक्षा नहीं रहती । यही बात तैत्तिरीय श्रुति भी कह रही है—‘शतं शुक्राणि यत्रैकं भवन्ति । सर्वे वेदा यत्रैकं भवन्ति । सर्वे होतारो यत्रैकं भवन्ति । स मानसीन आत्मा जनानाम्’ ।१ उसी तरह काठक श्रुति भी कह रही है—‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति । एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम’ ।२ अतः जिसमें समस्त देववृन्द, वेद, भगवन्नामोच्चारण, जप आदि सब एकता को प्राप्त हो जाते हैं, उस मानस तीर्थ में जाना चाहिये, जिसमें स्नान करके मनुष्य अमर हो जाता है ॥ ४० ॥ न चास्ति शब्दादिरनन्यवेदनः परस्परेणापि न चैव दृश्यते । परेण दृश्यास्तु यथा रसादयः तथैव दृश्यत्वत एव दैहिकाः ॥४१॥ न चेति—शब्द-स्पर्शादि विषय स्वयं जड़ हैं, वे स्वयंप्रकाश नहीं हैं, और वे स्वयं जड़ होने के कारण ही परस्पर एक-दूसरे से प्रकाशित नहीं हो पाते हैं । अतः ये शब्द-स्पर्श-रसादि बाह्य विषय, जैसे किसी दूसरे के दृश्य माने जाते हैं, उसी प्रकार शारीरिक रसादि विषय भी दृश्य होने के कारण परप्रकाश्य ही हैं ॥ ४१ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार कृतार्थ करा देने वाले ज्ञानतीर्थ को किस उपाय से प्राप्त किया जाय ? यह जिज्ञासा होने पर पूर्वोक्त पदार्थविवेक ही उसके प्राप्ति का उपाय है, यह बताने के लिये प्रथमतः आत्मा की स्थूल देह से भिन्नता को स्पष्ट कर रहे हैं । शब्द से लेकर गन्ध तक जितने विषय हैं, वे अनन्यवेदन नहीं हैं, अर्थात् स्वयंप्रकाश नहीं हैं । तथा वे परस्पर एक-दूसरे से भी प्रकाशित नहीं होते हैं । अर्थात् शब्द से स्पर्श, तथा स्पर्श से शब्द इस प्रकार परस्पर के द्वारा भी प्रकाशित नहीं किये जाते हैं, क्योंकि वे सभी जड़ हैं । व्यवहार सर्वदा वस्तु को देखकर ही होता है, बिना देखे नहीं होता । शब्दादि विषयों का दर्शन स्वतः भी नहीं और परस्परतः भी नहीं, परिशेषात् स्वविलक्षण अजड १. ( तै. आ. ३।११ ) २. ( कठ. उ. ४।१४ ) १२