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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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नान्यदन्यत्प्रकरणम् १०९ में समर्थ नहीं हैं। श्रुति भी यही कह रही है—"न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा१" इति । तथा "यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह२" इति ॥ ३१ ॥ व्यापकं सर्वतो व्योम मूर्तेः सर्वैर्वियोजितम् । यथा तद्विद्विहात्मानं *विद्याच्छुद्धं परं पदम् ॥ ३२ ॥ व्यापकमिति—जैसे व्यापक आकाश, सम्पूर्ण मूर्त पदार्थों से सर्वथा सम्बन्धशून्य है, वैसे ही वेदान्त के सिद्धान्त में आत्मा को शुद्ध परब्रह्मस्वरूप समझो ॥ ३२ ॥ हृदयस्पर्शिनी जब कि आत्मा, किसी शब्द का, प्रत्यय का, वाणी का—किसी प्रमाण का विषय ही नहीं है, तो उसे वेदान्त-वेदनीय (वेद्य) कैसे कहा जाय ? उत्तर में कहा जाता है कि लक्षणा का ही एक मार्ग है, जिससे वह जाना जाता है। जिस प्रकार व्यापक आकाश, सम्पूर्ण मूर्त पदार्थों से सर्वथा सम्बन्धशून्य है, उसी प्रकार यहाँ वेदान्त सिद्धान्त में शुद्ध अर्थात् अवस्थात्रयोपाधि से रहित और अवस्थात्रय के साक्षीरूप से लक्षित परब्रह्मस्वरूप आत्मा को समझना चाहिये ॥ ३२ ॥ दृष्टं हित्वा स्मृतिं तस्मिन्सर्वग्रश्च तमस्त्यजेत् । सर्वदृग्ज्योतिषा युक्तो दिनकृच्छार्वरं यथा ॥ ३३ ॥ दृष्टमिति—जिस प्रकार भगवान् सूर्य, रात्रि के अन्धकार को नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार मुमुक्षु पुरुष जाग्रत् अवस्था में दृष्ट (देखे हुए) पदार्थों का त्याग करे, और उनकी स्मृति (स्मरण = यानी स्वप्न में देखे हुए पदार्थों) का भी त्याग करे, और आत्मा के सर्वप्रकाशक तेज से युक्त होकर सबको अपने में लीन करने वाले (सुषुप्ति अवस्था के) अज्ञान का भी परित्याग कर दे ॥ ३३ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार आत्मतत्त्व का निश्चय रहने पर पुनः अवस्थात्रय (तीन अवस्थाओं) का अभिमान वह नहीं कर सकेगा। द्रष्टा, श्रोता, मन्ता इस प्रकार एक-एक क्रिया से उसे सम्बद्ध समझने का अभिमान न करे। अर्थात् दर्शनादि की अवस्था में भी आत्मा को निर्विशेष ही समझे। उस दृष्ट (देखे हुए) पदार्थ की स्मृति (स्वप्न) का भी त्याग करे। अर्थात् मैं स्वप्न में देव हुआ, व्याघ्र बना, इस प्रकार के अभिमान का त्याग करे। स्वप्न भी संस्कारद्वारक (संस्कार के कारण) होने से उन्हें भी 'स्मृति' शब्द से कहा गया है। यह स्वप्न (स्मृति) की वासना से विशिष्ट दृश्य, मन का ही विकार है, आत्मा का नहीं, इस प्रकार से असंगत (असम्बद्ध) आत्मा का अनुसन्धान करते रहना चाहिये। उसी तरह सुषुप्ति (तम) का भी त्याग करे। यह तम सब को ग्रस लेता है, अतः उसे 'सर्वग्रस्' कहते हैं। 'सर्वं ग्रसतीति सर्वग्रः' । यह आत्मा, सुषुप्ति का भी अवभासक है, अतः उसका प्रकाशस्वभाव कभी भी लुप्त नहीं होता। उसे मूढ या ज्ञानवान् नहीं समझना चाहिये। अतः जिस प्रकार रात्रि के अन्धकार को सूर्य नष्ट कर देता है, उसी प्रकार आत्मजिज्ञासु व्यक्ति जाग्रत् अवस्था में देखे हुए पदार्थ को त्यागकर उनकी स्मृति अर्थात् स्वप्नदृष्ट पदार्थों का त्याग करे, पश्चात् आत्मा के सर्वप्रकाशक तेज से युक्त होकर सबको अपने में लीन करने वाले सुषुप्ति अवस्था के अज्ञान का भी त्याग कर दे। इन तीनों अवस्थाओं का त्यक्ता कौन है ? उत्तर यह है कि सर्वसाक्षी प्रत्यगात्मा जो ज्योति (ब्रह्म) के साथ एकीभूत है। क्योंकि 'ज्योतिषां ज्योतिः३' के द्वारा ब्रह्म को बताया गया है। इस रीति से अद्वयानन्दस्वभाव ही आत्मा सिद्ध होता है ॥ ३३ ॥ ─────────────────────── १. ( मुं० उ० ३।१।८ ) २. ( तै० उ० २।९ ) ३. ( मुं० उ० २।२।९ )

  • विन्द्यात्० पाठान्तरम् ।