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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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११० उपदेशसाहस्री रूपस्मृत्यन्धकारार्थाः प्रत्यया यस्य गोचराः। स एवात्मा समो द्रष्टा सर्वभूतेषु सर्वगः ॥३४॥ रूपेति—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति के पदार्थ जिसके विषय हैं, वही समस्त भूतों में व्याप्त, सर्वगत, निर्विशेष, साक्षी 'आत्मा' है ॥ ३४ ॥ हृदयस्पशिनी रूप, स्मृति, अन्धकार, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, आदि पदार्थ जिन प्रत्ययों के विषय हैं, वे प्रत्यय भी जिस साक्षी के प्रतिभास्य (गोचर) होते हैं, वही आत्मा है, वही समस्त भूतों में व्याप्त रहने वाला द्रष्टा है, तथापि वह निर्विशेष (सम) है, क्योंकि वह परिच्छेदरहित (सर्वग) है ॥ ३४ ॥ आत्मबुद्धिमनेाक्षार्थविषयालोकसङ्गमात् । विचित्रो जायते बुद्धेः प्रत्ययोऽज्ञानलक्षणः ॥३५॥ आत्मेति—'आत्मा' को निर्विशेष बताया गया है तो विचित्र प्रकार के ज्ञान क्यों होते हैं ? इसका उत्तर यह है कि आत्मा, बुद्धि, मन, इन्द्रिय, विषय और प्रकाश का संयोग होने से अज्ञानरूप उपाधि के कारण बुद्धि से विविध प्रकार के ज्ञान हुआ करते हैं ॥ ३५ ॥ हृदयस्पशिनी यदि आत्मा निर्विशेष (समस्त विशेषताओं से रहित) है, तो विविध प्रकार के ज्ञान (विचित्र संसारप्रत्ययो- दय) किस प्रकार होते हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में कहा गया है कि आत्मा, बुद्धि, मन, इन्द्रिय, विषय और प्रकाश का संयोग होने पर अज्ञानरूप उपाधि के कारण बुद्धि से नाना प्रकार के ज्ञान होते हैं। यहाँ ज्ञातव्य यह है—आत्मा को असंग बताया जाता है। जब कि वह असंग है, तब उससे किसी का भी सम्बन्ध होना कभी संभव ही नहीं हो सकता। तथापि यहाँ पर बुद्धि आदि के साथ उसका संबंध बताया जा रहा है, वह कैसे संगत हो सकता है ? उसका उत्तर यही होगा कि वास्तव में आत्मा के साथ उनका सम्बन्ध नहीं है, तथापि अज्ञानरूप उपाधि के कारण कल्पित संबंध माना जाता है, उस कारण यह भेदज्ञान होता है। कोई भी ज्ञान, आत्मा के बिना तो होता ही नहीं, अतः उसका संबंध तो मानना ही पड़ेगा। बुद्धि, ज्ञान का आश्रय है। मन, साधारण कारण है। इन्द्रियाँ, विशेष कारण हैं। विषय, निमित्त कारण है। प्रकाश के बिना वस्तु की प्रतीति होती नहीं, इसलिये वह भी उसके ज्ञान में कारण है। एवं च अविद्यापरिकल्पित उपाधियों का और आत्मा का विवेक उपलब्ध न होने से अनर्थात्मक विचित्र संसार की प्रतीति होती रहती है ॥ ३५ ॥ विविच्यास्मात्स्वमात्मानं *विद्याच्छुद्धं परं पदम् । द्रष्टारं सर्वभूतस्थं समं सर्वभयातिगम् ॥३६॥ विविच्येति—मुमुक्षु पुरुष को चाहिये कि वह बुद्धि आदि के संघात से आत्मा का विवेक करे यानी आत्मा को पृथक् समझे। उसे शुद्ध, साक्षी, सर्वभूतान्तर्यामी, निर्विशेष (सम) और सर्वभयातीत प्राप्तव्य स्थान समझे ॥ ३६ ॥ हृदयस्पशिनी अविद्या और उसकी कार्यरूप उपाधियों के साथ आत्मा का विवेक (भेद) उपलब्ध न हो सकने से ही संसार का प्रतिभास हुआ करता है, यह निश्चित हो जाने पर मुमुक्षु का कर्तव्य बताते हैं—इस बुद्धि आदि के संघात से विवेक करके मुमुक्षु पुरुष को अपने परमप्राप्तव्य, शुद्ध, साक्षी, सर्वभूतान्तर्यामी, निर्विशेष, सर्वभयातीत (आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये) ॥ ३६ ॥

  • विन्द्यात्०—पाठान्तरम् ।