उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in contextनान्यदन्यत्प्रकरणम् १११ समस्तं सर्वगं शान्तं विमलं व्योमवत्स्थितम् । निष्कलं निष्क्रियं सर्वं नित्यं द्वन्द्वैर्विर्वाजितम् ॥३७॥ समस्तमिति—सर्वस्वरूप, सर्वगत, शान्त, निर्मल, आकाश की तरह सर्वत्र व्याप्त, निरवयव (निष्कलं), निष्क्रिय, सर्वमय, नित्य एवं सुख-दुःखादि द्वन्द्वों से रहित इस प्रकार से आत्मा को समझना चाहिये ॥ ३७ ॥ हृदयस्पर्शिनी उसी वेद्य आत्मस्वरूप को पुनः अन्य विशेषणों से युक्त करके बता रहे हैं—सर्वस्वरूप, सर्वगत, शान्त, निर्मल, आकाश के समान सर्वत्र स्थित, निरवयव, निष्क्रिय, सर्वमय, नित्य, एवं सुख-दुःखादि द्वन्द्वों से रहित आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। मूल में ‘समस्त’ और ‘सर्व’ शब्द प्रयुक्त हुए देखकर पुनरुक्ति की शंका नहीं करनी चाहिये। क्योंकि 'समस्त' शब्द 'आत्मा' को और 'सर्व' शब्द 'ब्रह्म' को बता रहे हैं अतः पुनरुक्ति नहीं है। यहाँ पर विधि-मुखेन और निषेधमुखेन जिन विशेषों का निर्देश किया गया है, उन सबका ‘त्वम्’ पदार्थ ‘साक्षी’ में, और ‘तत्’ पदार्थ-‘ब्रह्म’ में अनुसन्धान करके इन दोनों की तुल्यलक्षणता का निश्चय करके ‘तत्त्वमसि’ वाक्य से ‘अहं ब्रह्म’ इस प्रकार निश्चय कर ले ॥ ३७ ॥ सर्वप्रत्ययसाक्षी ज्ञः कथं ज्ञेयो मयेत्युत । विमृश्यैवं विजानीयाज्ज्ञानकर्म न वेति वा ॥३८॥ सर्वेति—सर्वविध प्रतीतियों का साक्षी जो ज्ञानस्वरूप आत्मा है, वह कैसा है ? वह मेरा ज्ञेय है या नहीं ? वह किसी प्रकार के ज्ञान का कर्म है या नहीं ? यह सब विचार करते हुए आत्मतत्त्व को जानना चाहिये ॥ ३८ ॥ हृदयस्पर्शिनी अपनी आत्मा के रूप में ही ब्रह्म को जाने, इस प्रकार जो बताया, उसी के सम्बन्ध में मुमुक्षु को पुनः कुछ और भी शिक्षा देते हैं—समस्त प्रतीतियों का साक्षी जो ज्ञानस्वरूप आत्मा है, वह कैसा है ? उसका विचार करना चाहिए। ‘कथं’ शब्द से सूचित ‘विमर्श’ को बता रहे हैं—वह आत्मा क्या घट आदि की तरह ज्ञेय है, अथवा नहीं ? यदि ज्ञेय हो तो क्या वह किसी प्रकार के ज्ञान का कर्म है, या नहीं ? इस प्रकार विचार कर ‘प्रत्यग्भूत अविषयत्वेन ज्ञात होनेवाला ब्रह्म है, वह किसी का विषय नहीं है’—इस रीति से आत्मतत्त्व को भी जानना चाहिए ॥ ३८ ॥ अदृष्टं द्रष्टृविज्ञातं दभ्रमित्यादिशासनात् । नैव ज्ञेयं मयाऽन्यैर्वा परं ब्रह्म कथंचन ॥३९॥ अदृष्टमिति—आत्मा दृश्य (दिखाई देने वाला) नहीं है, वह तो सबको देखने वाला (द्रष्टा) है, ‘जो ज्ञान का विषय (ज्ञेय) होता है, वह तो अल्प होता है’—ऐसा श्रुतिवचन है। अतः परब्रह्म मेरे अथवा किसी अन्य के द्वारा किसी प्रकार से भी ज्ञेय नहीं है ॥ ३९ ॥ हृदयस्पर्शिनी उक्त रीति से विमर्श करने पर ब्रह्म और आत्मा के सम्बन्ध में जो ज्ञेयत्व पक्ष है, वह संभव नहीं हो सकता। ‘आत्मा दृश्य न होकर सबको देखनेवाला (द्रष्टा) है,’ ‘जो ज्ञान का विषय होता है, वह अल्प होता है’१ इत्यादि श्रुतिवाक्य होने के कारण परब्रह्म मेरे अथवा किसी अन्य के द्वारा किञ्चित् भी ज्ञेय नहीं है२। यदि उसे ज्ञेय कहेंगे तो उसमें अल्पत्व होगा और अल्पत्व होने पर अब्रह्मत्वापत्ति होगी ॥ ३९ ॥ स्वरूपाव्यवधानाभ्यां ज्ञानालोकस्वभावतः । अन्यज्ञानानपेक्षत्वाज्ज्ञातं *चैव सदा मया ॥४०॥ १. ‘‘यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणोरूपम्’’—(के० उ० ९) २. ‘‘अदृष्टमविज्ञातम्’’—( बृ० उ० ३।८।११ )
- ब्रह्म०—पाठान्तरम् ।