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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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( viii ) जा सकता है। एक बार इसको समझ लेने पर सभी ईश्वर-विषयक मान्यताएँ संगत हो जाती हैं और सभी साम्प्रदायिक व धार्मिक विरोधों का अन्त हो जाता है। आचार्य शङ्कर ने इसी को आधार बनाकर तत्कालीन सभी सम्प्रदायों को एक हिन्दू-धर्म में अन्तर्भूत किया। आज भी उनकी दृष्टि से देखकर सभी विश्वधर्मों को सनातन धर्म में अन्तर्भूत करने की आवश्यकता है। अन्य धर्मावलम्बी प्रायः एक साम्प्रदायिक मान्यता को सभी पर लागू करने को धर्म-परिवर्तन मानकर लोगों को अपने झण्डे के नीचे लाने में विश्वास करते हैं। वेदान्ती उन्हें अपने धर्म में रहते हुए, अपनी सनातन कुल- मर्यादाओं को मानते हुए, सभी मान्यताओं को व्यावहारिक दृष्टि से एक-जैसी मान कर उन्हें पारमार्थिक दृष्टि से निर्विशेष प्रत्यगात्मा से अभिन्न स्वीकारने को ही वास्तविक धर्म-परिवर्तन एवं सनातन धर्म के झण्डे के नीचे आना मानता है। युग की पुकार है कि इस दृष्टि का प्रचार कर कम-से-कम प्रारम्भ में भारत के सभी धार्मिक समूहों में शान्ति व सौहार्द की स्थापना की जा सके एवं चूंकि भारत में विश्व के सभी धर्म पुष्कलरूपेण मौजूद हैं अतः इस प्रयोग के सफल होने पर विश्व भर में इसी सौहार्द की स्थापना की जा सके। सभी धर्म किसी माध्यम से ही ईश्वर की प्राप्ति मानते हैं। वेदान्त स्वयं जीव के वास्तविक स्वरूप प्रत्यगात्मा को ही माध्यम मानता है। चूंकि दूसरे माध्यम भी अन्ततोगत्वा प्रत्यगात्मा रूप से ही माध्यम सिद्ध होते हैं, अतः उनसे अविरोध ही आचार्य शङ्कर को मान्य है। उपदेशसाहस्री में प्रत्यगात्मा के माध्यम का जितना स्पष्ट व सटीक विवेचन हुआ है, अन्यत्र दुर्लभ है। अतः इसका आज के युग में विशेष महत्त्व है। ब्रह्मसूत्र को सर्वज्ञ शङ्कर 'शारीरिक मीमांसा' कहते हैं। उनकी दृष्टि में ब्रह्म का विचार शरीर में स्थित चेतना से प्रारम्भ होता है एवं सर्वशरीररूप में सर्व में स्थित ब्रह्म रूप की प्राप्ति में समाप्त होता है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि संसार में किसी भी दर्शन या धर्म में मनुष्य उतना मूल्यवान नहीं है जितना अधिक मूल्य उसे शाङ्कर वेदान्त में प्राप्त है। सर्वज्ञ शङ्कर मानते हैं कि अविचार से जो जीव है, विचार से वही ब्रह्म है। 'अशनायादिनिर्मुक्तः सिद्धो मोक्षस्त्वमेव सः' (उ० सा० तत्त्वमसि० २०६)। विचार से पूर्व जीव के कष्टों को स्वीकार करते हुए भी उसकी वास्तविकता को आचार्य ने अस्वीकारा है। आचार्य के समस्त दृष्टिकोण को समझने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य का जो चित्र वे खींचते हैं, उसमें उसका परम-प्रयोजन या अन्त अत्यन्त सुरक्षित है। उसकी पूर्णता (integrity) व असामान्य अभिव्यक्तियों का विस्तार अनुपम है। बीसवीं शताब्दी के अन्तिम चरण का जो निराशा का माहौल है, उसको मानो आचार्य शङ्कर चुनौती देते हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य की जो शारीरिक सीमाएँ उसे अनगिनत कमजोरियों व दुःखों का घर बना रही हैं, वे केवल क्षणिक हैं। मनुष्य का मूल्य उन कमजोरियों से नहीं लगाना है वरन् हमें तो उसको उसके ब्रह्मरूप से आंकना है, जो उसकी अन्तिम अपितु सहज पूर्णता है। यही उसका निश्चित् रूप है। वर्तमान जीवनक्रम व उसके भिन्न रूप तभी मूल्यवान् लगते हैं जब उन्हें उन्नति के सोपान के रूप में, व विकासशील रूप में समझा जाता है। इसी से इसे दिशा-निर्देश भी प्राप्त होता है। यह सत्य है कि आपाततः मनुष्य-जीवन एक पहेली है। पहेली को समझे बिना मनुष्य क्रिया व निष्क्रियता के बीच डोलता रहता है। संशय में पड़ा रहता है कि वह पशु है या देव। विवेक व कामनाओं के बीच अपने को झुंझलाता हुआ पाता है। इस असीम विश्व की विस्तृति उसकी समझ के परे लगती है। वह अपने को अति तुच्छ रूप में देखता है। उसे आत्मज्ञान व्यर्थ-सा लगता है। परन्तु इतने पर भी वह पाता है कि वह ऐसा यन्त्र है जिसमें विश्व के पदार्थों की ज्ञानरूप आहुति डालते हैं। ये पदार्थ अर्थशून्य हैं, अनर्ह हैं। परन्तु मनुष्य में जाकर इन्हें प्रयोजनवत्ता की नवीन गुणवत्ता प्राप्त हो जाती है। ये अर्ह हो जाते हैं। यह जो मानव की आध्यात्मिक शक्ति है कि विश्व को समझ कर विश्वातीत्त का दर्शन कर सके, यही उसकी वास्तविकता है क्योंकि वह स्वयं ही विश्वातीत तत्त्व है। निरन्तर परिवर्द्धमान, विकासशील और सप्रयोजन जिज्ञासा ही इसे 'प्रज्ञानं ब्रह्म' का साक्षात्कार कराती है। 'अज्ञानं कल्पनामूलं संसारस्य नियामकम् । छित्वाऽऽत्मानं परं ब्रह्म विद्यान्मुक्तं सदाऽभयम्' (उ० सा० पार्थिव० १७)। विश्वधर्म को उपनिषद् की सबसे बड़ी देन है जीव, जगत् व ईश्वर की अधिष्ठानदृष्ट्या एकरूपता। यह बात दूसरी है कि जगत् का स्वरूप से बाध होता है व जीव तथा ईश्वर की उपाधिमात्र का। 'आत्माभासाश्रयाच्चैवं मुखा- भासाश्रया यथा। गम्यन्ते शास्त्रयुक्तिभ्यामाभासासत्त्वमेव च (उ० सा० तत्त्वमसि० ४३)। यह आभास बनना या अनुप्रवेश क्या है? सदाशिव का स्थूल-सूक्ष्म देहों के साथ अभिन्नतया प्रतीत होना ही प्रवेश है। असंभव होने से यह