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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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( ix ) आविद्यक ही हो सकता है। देह आपस में भिन्न हैं, पर उन सभी में वह तो एक जैसा ही प्रविष्ट है। 'विविच्यस्मात्स्वमात्मानं विद्याच्छुद्धं परं पदं । द्रष्टारं सर्वभूतस्थ समं सर्वभयातिगम् ( उ० सा० नात्यदन्यत्० ३६) । तात्पर्य है कि हार्दाकाश में निरुपाधिक साक्षात्कार होने के निमित्त से ही अनुप्रवेश कहा गया है। जीव स्थूल-सूक्ष्म उपाधि में वर्तमान परब्रह्म ही है एवं वही व्यावहारिक अनुभूतियों का प्रमाता है। 'तस्मात्पर एवैकः सर्वेषां भूतानां अन्तर्रात्मा जीवभावेन अवस्थितः'। तत्त्वमीमांसा करने पर महेश्वर ही उपाधि द्वारा मनुष्य कहा जाता है। इससे अधिक श्रेष्ठता मनुष्य की क्या बतायी जा सकती है ? यह सत्य है कि उपाधि अविद्या का ही कार्य है। अविद्या ही शिव, विश्व और जीव का भेद उपस्थापित करती है। मानव के स्थूल-सूक्ष्म शरीर रूपी उपाधि की भौतिकता वेदान्तमान्य है। मन भी भौतिक है एवं दृश्य के अन्तःपाती है, द्रष्टा के अन्तःपाती नहीं। उपाधियों की आविद्यकता महत्त्वपूर्ण है। आत्मज्ञान उनका बाधक इसीलिए है कि वे आविद्यक हैं। परन्तु वे व्यावहारिक सत्य हैं एवं वही प्रति जीव के विशेष भाव का हेतु हैं। श्रीडिङ्कर अपने 'किञ्जीवनम्' नामक ग्रन्थ में बताते हैं कि जैसे हम कई मटके या मकान देखते हैं, वैसे हमें कभी भी कई चेतन नहीं दीखते । 'मैं' चेतन ही एकमात्र प्रतीत होता है। वे आगे कहते हैं कि आकाश व काल ही बहुत्व निर्माण करने वाले हैं। अतः दिक्कालातीत होने से चैतन्य कभी बहुत्व को प्राप्त नहीं कर सकता। इसीलिये 'ज्ञातेवाहम्विज्ञेयः शुद्धो मुक्तः सदेत्यपि । विवेकी प्रत्ययो बुद्धेर्हृष्टत्वान्नाशवान्यतः ( उ० सा० प्रकाश० १४) । जीव में ईश्वर का अन्तर्यामित्व अभेद से है, दो चैतन्य भिन्न होकर नहीं। अतः वेदादि सच्छास्त्रों में जहाँ इस प्रकार के वचन हैं, वे भेदप्रतिपादनार्थ नहीं हैं। भेदसिद्धि के लिए उनका प्रयोग करने पर चैतन्य के बहुत्व का अनुभव तथा युक्तिविरोध प्राप्त होकर वेदार्थ ही सन्दिग्ध या अविश्वस्त हो जायगा। अतः द्वैतवादियों के 'द्वा सुपर्णा' या अन्तर्यामी ब्राह्मण के द्वारा जीव व ईश्वर के भेद का प्रतिपादन सर्वथा असंगत है। अयौक्तिक, अननुभूत अथच अविचारित भेद का अनुवाद श्रुति करे यह तो सम्भव है, पर उसका प्रतिपादन करे यह सम्भव नहीं। परमतत्त्व के तीन प्रकार के वर्णन उपनिषद् में प्राप्त होते हैं। निर्विशेष ब्रह्म का ज्ञेयार्थ निरूपण एवं सविशेष ब्रह्म का ध्यान करने के लिए प्रतिपादन श्रुतियों में तात्पर्य से किया गया है। कर्म व कर्मफल का कर्ता व भोक्ता रूप जिज्ञासु को अनुभवसिद्ध होने से उसका अनुवाद किया है एवं उसका तात्पर्य जीव के वास्तविक स्वरूप का विवेक करके उसकी ब्रह्म से अभिन्नता प्रतिपादन करना है। ब्रह्म की चेतनता श्रुति बताती है परन्तु चेतनता क्या चीज है, यह तो जीव को अपने स्वरूप में ही अनुभूत है। अतः ब्रह्म जीव से अभिन्नरूप न हो तो सदा ही परोक्ष रहेगा, ब्रह्मसाक्षात्कार असम्भव हो जायगा। वेदादि शास्त्र मुमुक्षु के लिए रद्दी की टोकरी में फेंकने लायक हो जावेंगे। अतः जीव ही, जो चेतन का एकमात्र अपरोक्ष रूप है, ब्रह्मापरोक्षता का स्थल हो सकता है। जीव की उपाधियों से ही वह जीव है अन्यथा ब्रह्म ही है। ईश्वरश्चेदनात्मा स्यान्नासावस्मीति धारयेत् । ......... अज्ञेयत्वेऽस्य किन्तैस्स्यादात्मत्वे त्वन्यधीहुतिः' ( उ० सा० ईश्वर० १,२) । अतः चेतन में भेद केवल उपाधिनिष्ठ है। तीन प्रकार के वर्णनों से तीन प्रकार के भिन्न चेतनों का कथन न होकर एक चेतन के तीन प्रकार की उक्ति अविचारित प्राप्त भेद की निवृत्ति के लिये ही है। कर्म व कर्मफल की व्यवस्था के बिना मानव के समग्र यत्न निरर्थक हो जावेंगे। यह शास्त्रीय उपासना रूप कर्म के लिए भी उतना ही सत्य है। अतः कर्मफलदाता ईश्वर ही ध्येय ब्रह्म होने से ध्यान का विषय भी है व ध्यान का फल देनेवाला भी। कर्म के द्वारा भी वही आराध्य है व वही फलदाता भी। इतना निश्चय होने पर वही ईश्वर लौकिक कर्मों के फलदाता रूप से भी स्वीकारा जाता है। इस प्रकार ईश्वर व जीव का सम्बन्ध स्वामी व सेवक भाववाला है। इसी भाव की भक्ति वेदान्तसम्मत है। ईश्वरत्व के भाव से रहित जिस भक्ति का प्रतिपादन किया जाता है, वह तो मूल को काटकर पत्ते को सींचने की तरह व्यर्थ है। पत्ते की चमक की तरह मन की एकाग्रता तो वहाँ भी उपलब्ध हो ही जायगी। 'ओमित्येवं सदात्मानं सर्वं शुद्धं प्रपद्यथ । सेतुं सर्वव्यवस्थानां अहोरात्रादि- वर्जितम्' ( उ० सा० सम्यङ्मति० ७७) ।