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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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नान्यदन्यत्प्रकरणम् ११५ विदिताविदिताभ्यां तदन्यदेवेति शासनात् । बन्धमोक्षादयो भावास्तद्वदात्मनि कल्पिताः ॥४९॥ विदितेति—"आत्मा विदित और अविदित से अन्य ही है" इस प्रकार श्रुति का शासन रहने से ज्ञातृत्व और कर्तृत्व के समान ही बन्ध-मोक्षादि भाव भी आत्मा में कल्पित ही समझने चाहिये ॥ ४९ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि'¹—आत्मा, विदित और अविदित से अन्य ही है—अर्थात् कार्य- कारण से अतिरिक्त ही यह आत्मतत्त्व 'ब्रह्म है'—इस प्रकार श्रुति का उपदेश होने से कार्य-कारण-धर्मविलक्षण- स्वभाववाला ही यह आत्मा है। एवंच जैसे आत्मा में ज्ञातृत्व, कर्तृत्व, कारणत्व आदि सब कुछ अविद्यावशात् ही कल्पित है, तथा बन्ध-मोक्ष, छिन्न-भिन्न, सुखी-दुःखी इत्यादि भाव आत्मा में कल्पित ही हैं, वास्तविक नहीं हैं ॥ ४९ ॥ नाहोरात्रे यथा सूर्ये प्रभारूपाविशेषतः । बोधरूपाविशेषात्तु बोधाबोधौ तथाऽऽत्मनि ॥५०॥ नाहोरात्र इति—जिस प्रकार समान भाव से प्रकाशस्वरूप होने के कारण सूर्य में दिन और रात्रि नहीं है, उसी प्रकार आत्मा के ज्ञानस्वरूप में कोई विशेषता न होने के कारण उसमें (आत्मा में) ज्ञान और अज्ञान भी नहीं हैं ॥ ५० ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा में बन्धादिकों को कल्पित बताने में दृष्टान्त के साथ हेतु भी बता रहे हैं—जिस प्रकार समान भाव से प्रकाशस्वरूप होने के कारण सूर्य में दिन और रात्रि नहीं हैं, उसी प्रकार आत्मा के ज्ञानस्वरूप में कोई विशेषता न होने के कारण उसमें ज्ञान और अज्ञान भी नहीं है। अबोधनिबन्धन बन्ध है, और बोधनिबन्धन मोक्ष है। एवंच आत्मा के स्वरूप में बोध और अबोध उन दोनों के अभाव में बन्ध और मोक्ष इन दोनों का भी अभाव है ॥ ५० ॥ यथोक्तं ब्रह्म यो वेद हानोपादानवर्जितम् । यथोक्तेन विधानेन स सत्यं नैव जायते ॥५१॥ यथोक्तमिति—जो मुमुक्षु उपर्युक्त प्रकार से ग्रहण-त्याग से रहित ब्रह्म को जान लेता है, उसे पुनः जन्म नहीं प्राप्त होता—यह सत्य है ॥ ५१ ॥ हृदयस्पर्शिनी उपर्युक्त उपायों के द्वारा अभिहित स्वरूप के ब्रह्म को जो जान लेता है, उसकी फलप्राप्ति को बता रहे हैं— जो व्यक्ति ऊपर निर्दिष्ट की हुई रीति से ग्रहण-त्यागशून्य ब्रह्म को जानता है, वह पुनः जन्म नहीं लेता, इसमें (इसकी सत्यता में) किसी प्रकार का भी सन्देह नहीं है। 'न स भूयोऽभिजायते'²—यह उक्त कथन में प्रमाण है। 'हानोपादानवर्जितम्' कहने से हानोपादानकर्तृत्व और कर्मत्व की व्यावृत्ति हो जाती है। इस कारण समस्त विशेषों का प्रतिषेध हो जाता है, क्योंकि सभी विशेष, परिग्रह-परित्यागरूप हुआ करते हैं ॥ ५१ ॥ जन्ममृत्युप्रवाहेषु पतितो नैव शक्नुयात् । इत उद्धर्तुमात्मानं ज्ञानादन्येन केनचित् ॥५२॥ जन्मेति—जन्म मृत्यु के प्रवाह में पडा हुआ मनुष्य, ज्ञान के अतिरिक्त किसी अन्य साधन (उपाय) के द्वारा इस प्रवाह से अपने को उबार नहीं सकता ॥ ५२ ॥ १. (के. उ. १।३) २. (भ. गी. १३।२३)