उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in context११६ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी यदि कोई कहे कि यथोक्त ब्रह्मज्ञान के बिना भी यथोक्त फल प्राप्त हो सकता है, अतः ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने की क्या आवश्यकता ? इस शंका के समाधान में कह रहे हैं कि जन्म-मृत्यु के प्रवाह में पतित मनुष्य ज्ञान के अतिरिक्त किसी अन्य साधन के द्वारा इस जन्म-मरण के प्रवाह से अपना उद्धार नहीं कर सकता। श्रुति भी कहती है—‘नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय’१—इससे उद्धार चाहनेवाला व्यक्ति, ब्रह्मज्ञान को ही प्राप्त करे। और कोई दूसरा उपाय नहीं है ।। ५२ ।। “भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे” इति श्रुतेः ॥५३॥ भिद्यत इति—“मोक्ष प्राप्ति का एकमात्र उपाय ज्ञान ही है”—इस कथन में यह श्रुतिवचन प्रमाण है— ‘आत्मा का साक्षात्कार हो जाने पर प्रवाहपतित इस पुरुष के हृदय की कामादिरूप ग्रन्थि टूट जाती है, उसके समस्त संशय ( सन्देह ) निवृत्त हो जाते हैं, तथा सम्पूर्ण कर्म क्षीण हो जाते हैं’ ॥ ५३ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस विषय में अथर्वोपनिषद् वाक्य को प्रमाणरूप से उद्धृत कर रहे हैं। “उस आत्मतत्त्व का साक्षात्कार (ज्ञान) हो जानेपर इस मुमुक्षु व्यक्ति के हृदय की काम-क्रोधादि ग्रन्थि टूट जाती है, उसके समस्त सन्देहों की निवृत्ति हो जाती है, तथा समस्त कर्म क्षीण हो जाते हैं,’ ॥ ५३ ॥ ममाहमित्येतदपोह्य सर्वतो विमुक्तदेहं पदमम्बरोपमम् । सुदृष्टशास्त्रानुमितिभ्य ईरितं विमुच्यतेऽस्मिन्यदि निश्चितो नरः ॥५४॥ ममेति—सम्यक् अनुशीलन किये हुए शास्त्र और अनुमान के द्वारा, स्थूल-सूक्ष्म उभयविध देहों से रहित, आकाश के सदृश ब्रह्म का निरूपण किया गया। यदि मुमुक्षु पुरुष सर्वथा ममता और अहंता को त्याग कर उसमें अपनी बुद्धि को स्थिरता से निश्चित कर ले तो अवश्य ही वह मुक्त होगा, यह नितान्त सत्य है ॥ ५४ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस ‘नान्यदन्यत्प्रकरण’ का संक्षेप में उपसंहार कर रहे हैं—यथार्थ रूप में विचार किये हुए शास्त्र और अनुमान के द्वारा स्थूल-सूक्ष्म द्विविध शरीरों से रहित यह प्रत्यक्तत्त्व आकाश के समान वर्णित ब्रह्म ही है, ऐसा निश्चय सर्वथैव अहंकार-ममता आदि विकारों का त्याग कर मुमुक्षु यदि कर ले, तो वह अवश्य ही मुक्त हो जाता है। क्योंकि यह ब्रह्मात्मैक्यभाव श्रुति-स्मृति से निर्धारित है, कल्पित नहीं है। अतः उसमें असंभावना नहीं करनी चाहिए ॥ ५४ ॥ ॥ इति पञ्चदशं नान्यदन्यत्प्रकरणं समाप्तम् ॥ १. ( श्वे. उ. ३।८ तथा ६।१५ )