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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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पार्थिवप्रकरणम् पार्थिवः कठिनो धातुर्द्रवो देहे स्मृतोऽम्भयः । पक्तिश्चेष्टावकाशाः स्युर्वह्नवाय्वम्बरोद्भूवाः ॥१॥ पार्थिव इति—देह [ शरीर ] में माँस आदि कठिन धातु पृथिवी के विकार हैं, तरल ( द्रव ) रुधिरादि धातु जल के विकार हैं, और पाक, चेष्टा तथा अवकाश क्रमशः अग्नि, वायु, और आकाश के कार्य हैं। इसलिये पञ्चभूतों का परिणामरूप यह शरीर 'आत्मा' नहीं है ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व प्रकरण में एकदेशिमत (भेदाभेदवाद) का खण्डन करते हुए यह सिद्ध कर चुके हैं कि ब्रह्मैकत्व (ब्रह्मात्मैक्य) ज्ञान ही स्वरूपावस्थानरूप मोक्ष का साधन है, भेदाऽभेदज्ञान नहीं। अब सम्पूर्ण तार्किकों के मत का खण्डन करके मुमुक्षु को स्वाराज्य पर अभिषिक्त करने के लिये यह 'पार्थिवप्रकरण' आरम्भ किया जा रहा है। इसमें सर्वप्रथम स्थूल शरीर को आत्मा मानने वालों के मत का निराकरण कर रहे हैं। स्थूल शरीर में मांसादिरूप जो कठिन धातु है, वह पार्थिव (पृथिवी का अंश, परिणाम, विकार) है, और रुधिरादि जो तरल धातु है, वह अम्मय (जल का परिणाम, विकार) है, और पाक (पक्ति), स्पन्दन (चेष्टा) और अवकाश (अन्न-पान-मन के सञ्चार मार्ग अर्थात् शरीरगत सुषिर=छिद्र) क्रमशः अग्नि, वायु और आकाश के कार्य हैं अर्थात् शरीरानुगत अग्नि आदि अंशों के कार्यरूप हैं। इस कारण पञ्चभूतों का परिणामभूत देह (शरीर) आत्मा नहीं है। वल्मीक जैसे बाह्यभूत के समान इस भौतिक शरीर को अनात्मा ही समझना चाहिये ॥ १ ॥ घ्राणादीनि तदर्थाश्च पृथिव्यादिगुणाः क्रमात् । रूपालोकवदिष्टं हि सजातीयार्थमिन्द्रियम् ॥२॥ घ्राणेति—घ्राणादि इन्द्रियाँ और उनके विषय गन्धादि क्रमशः पृथिवी आदि भूतों के गुण हैं, क्योंकि रूप और प्रकाश के समान इन्द्रिय और उनके विषय, दोनों को सजातीय माना गया है ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी इन्द्रियों को आत्मा माननेवालों के मत का निराकरण कर रहे हैं— घ्राणादि इन्द्रियाँ और उनके गन्धादि विषय, क्रमशः पृथिवी आदि भूतों के गुण हैं, अर्थात् कार्य हैं। पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश के क्रमशः गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द ये प्रसिद्ध धर्म हैं। ये सब घ्राणादि एक- एक इन्द्रिय से ग्राह्य हैं—यह अन्वय-व्यतिरेक से सिद्ध है। रूप और प्रकाश के समान इन्द्रिय और उनके विषय दोनों सजातीय माने गये हैं। जो इन्द्रिय, जिसके धर्म का ग्रहण करती है, अर्थात् यज्जातीय के अर्थ को प्रकाशित करती है, वह इन्द्रिय उसकी सजातीय हुआ करती है—जैसे तैजस रूप का प्रकाशक दीपादि, तैजस देखा गया है। उसी तरह इन्द्रियाँ भी भौतिक पदार्थों की प्रकाशक होने से भौतिक ही हैं। नेत्र तेज का कार्य है, उसका विषय रूप भी तेज का ही कार्य है। इसी प्रकार घ्राण और गन्ध, रसना और रस, त्वक् और स्पर्श, श्रोत्र और शब्द भी क्रमशः पृथवी, जल, वायु एवं आकाश के ही कार्य हैं। इससे गृहीता और ग्राह्य का साजात्य सिद्ध होता है। सम्पूर्ण प्रपञ्च का चरम गृहीता आत्मा है। अतः उसका ग्राह्य सम्पूर्ण प्रपञ्च भी वस्तुतः आत्ममय ही होना चाहिये। इसी कारण प्रमातृ चैतन्य और विषयचैतन्य के संयोग से ही प्रत्यक्षादि प्रमा की उत्पत्ति कही गई है। अतः प्रमाता, प्रमेय और प्रमा सभी चिन्मय हैं। इसीलिये श्रुति कह रही है कि 'सर्वं ब्रह्ममयं जगत्'—सब कुछ ब्रह्म ही है—यही सिद्धान्त है। अनुमान प्रयोग इस प्रकार होंगे—'घ्राणं पार्थिवं, रूपादिषु गन्धस्यैव व्यञ्जकत्वात् हिङ्गुवत् ।', 'रसनम् आप्यं रसादिषु रसस्यैव व्यञ्जकत्वात्