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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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पार्थिवप्रकरणम् १२९ कारण दूध है। किन्तु बौद्ध मत के अनुसार यदि सभी पदार्थ क्षणिक माने जाते हैं तो कार्य के नियत पूर्ववर्तीरूप से कारण के रहने की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिये। यदि कहो कि पदार्थों को क्षणिक मानने पर भी उनका सन्ततिक्रम तो चलता ही रहता है। अर्थात् कदाचित् बौद्ध यह कहें कि कार्य-कारण में अत्यन्त भिन्नता रहने पर भी, उनमें सन्ततिक्रम (धाराप्रवाह) चलते रहने के कारण एक-दूसरे की अपेक्षा हो सकती है, तो यह बात अनुचित है। जैसे दही से पहले कारणरूप से दूध का होना आवश्यक है, तथापि दुग्धसन्ततिक्रम से दधिसन्ततिक्रम सर्वथा भिन्न है, इसलिये जिस प्रकार दधिसन्ततिक्रम के कारणरूप से दुग्धसन्ततिक्रम की अपेक्षा होती है, वैसे ही वालुकादि अन्य सन्ततिक्रम से भी दधि की उत्पत्ति क्यों नहीं होती ? न हो सकने में कोई बाधा नहीं होनी चाहिये। यदि दूध और दही का वास्तव में कोई सम्बन्ध नहीं है, तो बालू से भी दही बनाया जाना चाहिये। यदि कहो कि पदार्थों के क्षणिक होने पर भी किसी-किसी कार्य में ही किसी विशेष पदार्थ की आवश्यकता होती है, किन्तु यह कहना भी उचित न होगा, क्योंकि क्षणिक होने के कारण किसी को भी किसी अन्य की अपेक्षा नहीं रहती ॥ २८ ॥ तुल्यकालसमुद्भूतावितेरेतरयोगिनौ । योगाच्च संस्कृतो यस्तु सोऽन्यं होक्षितुमर्हति ॥२९॥ तुल्यकालेति-एक साथ उत्पन्न होने वाले दो पदार्थ जब परस्पर एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं, तब उन दोनों का सम्बन्ध होने पर जो जिससे संस्कार प्राप्त करता है, वही दूसरे की अपेक्षा किया करता है ॥ २९ ॥ हृदयस्पर्शिनी जैसे अंकुर और पर्जन्य तुल्यकालसमुद्भूत हैं, अर्थात् एक साथ उत्पन्न होते हैं, और उनका परस्पर सम्बन्ध भी है। उन दोनों में से जो अंकुर पदार्थ है, वही पर्जन्य के सम्बन्ध से अतिशयित होता है। अतिशय को प्राप्त (संस्कृत) हुआ वह अंकुर पदार्थ, अन्य पर्जन्य की अपेक्षा करता है। किन्तु क्षणभङ्गुरवाद में दोनों भिन्नकालिक होने के कारण परस्पर उन दोनों में सम्बन्ध न होने से उपकार्योपकारक-भाव अनुपपन्न है, अतः अंकुर को पर्जन्य की अपेक्षा नहीं होनी चाहिये। किन्तु हमारे मत में पर्जन्य और अंकुर में उपकार्योपकारक-भाव है। पर्जन्य, अंकुर का उपकारक है और अंकुर उसका उपकार्य है। अतः अंकुर को पर्जन्य की अपेक्षा हो सकती है और यह बात स्थायित्व होने पर ही संभव है। जो जिससे उपकृत (संस्कृत) होता है, वह उस संस्कारकर्त्ता की अपेक्षा करता है ॥ २९ ॥ मृषाध्यासस्तु यत्र स्यात्तन्नाशस्तत्र नो मतः । सर्वनाशो भवेद्यस्य मोक्षः कस्य फलं वद ॥३०॥ मृषेति-अभी तक बौद्धों के मत का खण्डन किया गया, अब अपने मत को बता रहे हैं- हमारे वेदान्त-सिद्धान्त में जहाँ (कर्तृत्व-भोक्तृत्वादिहीन्य ब्रह्म में) कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि का मिथ्या अध्यास होता है, वहीं 'मैं ब्रह्म हूँ' इस बोध से उस अध्यास का नाश होता है, अधिष्ठानभूत ब्रह्म का कभी नाश नहीं होता। किन्तु जिसके मत में सर्वनाश (सभी का नाश) हो जाता है, तब मोक्षरूप फल की प्राप्ति किसे होगी ? तुम ही बताओ ॥ ३० ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार क्षणिकमत का निराकरण कर अब शून्यमत का भी निराकरण करेंगे, किन्तु उससे पूर्व अपने मत का सामञ्जस्य बता रहे हैं। वेदान्तमत के अनुसार ब्रह्मरूप आत्मा में किसी प्रकार का कोई अतिशायाधान न होने से क्षणिकमत के समान वेदान्त में भी मोक्ष की अनुपपत्ति माननी पड़ेगी। इस आशंका का उत्तर यह है कि ब्रह्मरूप आत्मा में किसी अतिशय का आधान न होने पर भी उसके (ब्रह्मरूप आत्मा के) स्थायी रहने से मोक्षरूप फल की उपपत्ति हो जाती है। अतः उक्त आशंका उपस्थित करना उचित नहीं है। वेदान्तसिद्धान्त में जहाँ कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि- शून्य अधिष्ठानरूप ब्रह्म में कर्तृत्वादिरूप संसार का मिथ्या अध्यास होता है, अथवा अविद्यानिबन्धन मृषाध्यासरूप भ्रम (कर्तृत्वादिसंसार का प्रतिभास) जहाँ होता है, वहीं पर 'अहं ब्रह्मास्मि' - मैं ब्रह्म हूँ - इस ज्ञान (विद्या) से अध्यस्त का विनाश हुआ करता है। तथाच अज्ञान के वश होने से जो बन्ध का अनुभव कर रहा हो, उसी को ज्ञान होने पर बन्ध १७