उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in context१३० उपदेशसाहस्री की निवृत्ति होने से शुद्धस्वरूपानुभवरूप पुरुषार्थ का लाभ होता है। अर्थात् 'अहं ब्रह्मास्मि' इस ज्ञान से अज्ञाननिवृत्ति के माध्यम से यथोक्त अध्यासत्तिवृत्तिरूप मोक्ष ही हमें विवक्षित है, हेयोपादेयरूप नहीं। तस्मात् हमारे पक्ष में वस्तुतः अतिशयाधान न होनेपर भी मोक्ष की अनुपपत्ति नहीं है। अतः वेदान्तियों का मत सामञ्जस्यपूर्ण है। अब शून्य- वादी के मत में दोष बताते हैं—जिस शून्यवादी के मत में अधिष्ठान, आरोप्य आदि सभी का नाश होने से न फल रहा और न फलभोक्ता रहा, तब मोक्षरूप फल का अधिकारी ही कौन रहा ? अतः मोक्षरूप फल के अधिकारी के रूप में किसी स्थिर (स्थायी) तत्त्व को अवश्य ही स्वीकार करना चाहिये । एवंच शून्यवादी के मत में 'मोक्ष' सिद्ध ही नहीं हो पाता है ॥ ३० ॥ अस्ति तावत्स्वयं नाम ज्ञानं वात्माऽन्यदेव वा । भावाभावज्ञतस्तस्य नाभावस्त्वधिगम्यते ॥३१॥ अस्तीति—सभी के सिद्धान्तों के अनुसार 'आत्मा' तो है ही। किन्तु विचारणीय प्रश्न इतना ही है कि वह (आत्मा) ज्ञानस्वरूप है या शून्य है ? हमारे वेदान्त सिद्धान्त के अनुसार तो वह (आत्मा) भाव और अभाव दोनों का साक्षी होने से उसे शून्यरूप नहीं कह सकते ॥ ३१ ॥ हृदयस्पर्शिनी शून्यवादी के अनुसार 'सर्वनाश' को ही मोक्ष कहना होगा। क्योंकि शून्य के परमार्थस्वभाव होने में इनके पास कोई प्रमाण नहीं है । 'स्वयं' तो सभी मानते हैं, उसे स्वयंप्रकाश ज्ञान, आत्मा, कहें या शून्य कहें ? कहने का तात्पर्य यह है कि कोई एक परमार्थवस्तु (परमार्थस्वभाव वस्तु ) अवश्य है। वह क्या है ? यही विचारणीय प्रश्न है। वह परमार्थवस्तु, लौकिक भाव-अभाव की अभिज्ञ (साक्षी) अर्थात् लोकव्यवहारसिद्ध भाव-अभाव पदार्थों को जाननेवाली है। अतः परमार्थवस्तु का अभाव नहीं कह सकते । तस्मात् 'शून्य' को परमार्थ वस्तु समझना उचित नहीं है। भाव-अभाव के अभिज्ञ किसी स्थिर साक्षी के अभाव में अर्थात् न मानने पर समस्त व्यवहार के लोप होने का प्रसंग प्राप्त होगा ॥ ३१ ॥ येनाधिगम्यतेऽभावस्तत्सत्स्यात्तन्न चेद्भवेत् । भावाभावानभिज्ञत्वं लोकस्य स्यान्न चेष्यते ॥३२॥ येनेति—जो अभाव को जानता है, वह जानने वाला कोई सत् ही होना चाहिये । अन्यथा लोगों को भाव और अभाव का ज्ञान ही नहीं होगा, जो किसी को भी अभीष्ट नहीं है ॥ ३२ ॥ हृदयस्पर्शिनी अपने शून्यवाद को सिद्ध करने के लिए यदि बौद्ध कहें कि उस परमार्थवस्तु के अभाव का भी ज्ञान यदि किसी को हो जाय ? तो जिसे वह ज्ञान होगा उसी का सत्त्व (सत्ता) होगा, शून्यत्व की शंका करने का अवसर ही कहाँ रहेगा ? अथवा पूर्वोक्त अर्थ को ही स्पष्ट कर रहे हैं—जो सभी के अभाव को जानता है, उसे सत् ही कहना होगा । अन्यथा लोगों को भाव और अभाव का ज्ञान ही नहीं हो पायगा। उसे इष्ट कहें तो स्वानुभवविरोध होगा, क्योंकि सभी को भाव और अभाव का ज्ञान रहता है। उसका अपलाप नहीं कर सकते । अतः भाव-अभाव का जो अभिज्ञ है, वही सत् आत्मा है । शून्य नहीं है ॥ ३२ ॥ सदसत्सदसच्चेति विकल्पात्प्राग्यदिष्यते । तदद्वैतं समत्वात्तु नित्यं चान्यद्विकल्पितात् ॥३३॥ सदिति—सत्-असत् और सदसत्—इस विकल्प से पूर्व जो वस्तु अभीष्ट है, वह समानरूप होने के कारण अद्वितीय और नित्य है एवं विकल्पित पदार्थों से भिन्न है ॥ ३३ ॥