उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
DevanagariSanskritpublished364 pages
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१३२ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी न्याय (तर्क) से द्वैत का मिथ्यात्व बताकर अब शास्त्र से भी उसके मिथ्यात्व को बताते हैं— 'घटादि विकार वाणी से आरम्भ हुआ करते हैं'¹ इस श्रुत्यात्मक शास्त्र से विकारों का अभाव स्पष्ट है। 'वाचारम्भण' शब्द अनृतत्व (मिथ्यात्व) का वाचक है, यह प्रतीत हो रहा है, क्योंकि उसके आगे ही कारण की सत्यता का निश्चय किया गया है। 'वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है'² इस श्रुत्यात्मक शास्त्र से द्वैतदर्शन (भेददृष्टि) की निन्दा की गई है। यदि द्वैत सत्य होता तो उसकी निन्दा न की गई होती। अर्थात् उसकी (द्वैत की) अनृतता (असत्यता) प्रतिपादित हो जाती है। मूलस्थित 'आदि' शब्द से साक्षात् द्वैतापवादक (द्वैत का बाधक) शास्त्र 'नेह नानास्ति किञ्चन'³ को भी समझना चाहिए। तथा 'मेरी माया का पार पाना कठिन है'⁴ यहाँ पर 'जो मेरे ही शरण आते हैं, वे इस माया का पार हो पाते हैं'—इस प्रकार परमात्मज्ञान से ही इस गुणमयी कार्यसहित माया की निवृत्ति की जा सकती है, —यह भगवान् स्वयं अपने श्रीमुख से बता रहे हैं। यदि द्वैत सृष्टि सत्य होती तो उनका यह कथन कैसे उपपन्न होगा ? अतः द्वैत मायिक है, यह सिद्ध हो जाता है ॥ ३५ ॥ विशुद्धिश्चात एवास्य विकल्पाच्च विलक्षणः । उपादेयो न हेयोऽत आत्मा नान्यैःप्रकल्पितः ॥३६॥ विशुद्धिरिति—अतएव 'आत्मा' शुद्ध स्वभाववाला और द्वैत से विलक्षण है। वह न ग्राह्य है, और न त्याज्य है और न किसी अन्य तत्त्व के द्वारा कल्पित ही है ॥ ३६ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार श्रुति तथा युक्ति से द्वैत का मिथ्यात्व बताया गया, उस कारण आत्मा का अद्वितीयत्व सुदृढ़ सिद्ध हुआ। अब अशुद्धि का कोई कारण न होने से उसकी विशुद्धि भी बतायी जा रही है— द्वैत के मिथ्या होने से ही आत्मा की धर्माधर्मतत्फलसंसपर्गरूप विशुद्धि भी स्पष्ट है। और विकल्पात्मक द्वैत से विलक्षण (विपरीत) स्वभाव का रहने से वह (आत्मा) न ग्राह्य (उपादेय) है, न त्याज्य (हेय) है। क्योंकि हानोपादान (त्याग और ग्रहण) तो मूर्त पदार्थ का होता है। अमूर्त प्रत्यगात्मा में उनका होना संभव नहीं है। किंच—किसी अन्य तत्त्व के द्वारा उसकी कल्पना करना शक्य न होने से भी वह विशुद्ध है। समस्त कल्पनाओं के अधिष्ठान की किसी के द्वारा कल्पना नहीं की जा सकती। अतः आत्मा नित्य शुद्ध है, यह सिद्ध होता है ॥ ३६ ॥ अप्रकाशो यथाऽऽदित्ये नास्ति ज्योतिःस्वभावतः । नित्यबोधस्वरूपत्वान्नाज्ञानं तद्वदात्मनि ॥३७॥ अप्रकाश इति—प्रकाशस्वरूप (ज्योतिःस्वभाव) होने के कारण जिस प्रकार सूर्य में अप्रकाश (अन्धकार) नहीं है, उसी प्रकार नित्यज्ञानस्वरूप [नित्यबोधस्वरूप] होने से आत्मा में अज्ञान नहीं है ॥ ३७ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा की कल्पना क्यों नहीं की जा सकती ? ऐसी शंका यदि कोई करे तो उसका उत्तर स्पष्ट ही है कि कल्पना का हेतुभूत अज्ञान, वस्तुतः आत्मा में नहीं है। अज्ञान से कल्पित तो अनात्म पदार्थ हैं। अतएव आत्मा में उसका अभाव है। आत्मा तो प्रकाशस्वरूप है। जिस प्रकार सूर्य में अन्धकार नहीं होता, उसी प्रकार आत्मा नित्यज्ञानस्वरूप होने से उसमें अज्ञान नहीं है ॥ ३७ ॥
१. (छां. उ. ६।१।४) २. (बृ. उ. ४।४।१९) ३. (बृ. उ. ४।४।१९) ४. (भ. गी. ७।१४)