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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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पार्थिवप्रकरणम् १३३ तथाऽविक्रियरूपत्वान्नावस्थान्तरमात्मनः । अवस्थान्तरवत्त्वे हि नाशोऽस्य स्यान्न संशयः ॥३८॥ तथेति—उसी प्रकार आत्मा निर्विकार रहने से उसमें [आत्मा में] कभी कोई अवस्थान्तर भी नहीं होता। यदि उसमें अवस्थान्तर हो तो निश्चय ही उसका विनाश होने का प्रसंग प्राप्त होगा ॥ ३८ ॥ हृदयस्पर्शिनी जैसे आत्मा, नित्यबोधस्वरूप होने से उसमें वस्तुतः अज्ञान नहीं रहता, उसी तरह वह (आत्मा) सर्व- विक्रियारहितस्वभाव (निर्विकार) रहने से उसमें कूटस्थताप्रच्युतिरूप अवस्थान्तर भी नहीं होता। यदि उसमें अवस्थान्तर हो तो निश्चय ही उसका नाश हो जायगा ॥ ३८ ॥ मोक्षोऽवस्थान्तरं यस्य कृतकः सं चलो ह्यतः । न संयोगो वियोगो वा मोक्षो युक्तः कथंचन ॥३९॥ मोक्ष इति—जिसके मत में मोक्ष को आत्मा का अवस्थान्तर कहा गया है, उसके सिद्धान्त के अनुसार वह कृतक होने से अनित्य है, क्योंकि ब्रह्म के साथ आत्मा के संयोग अथवा वियोग को मोक्ष मानना किसी प्रकार उचित नहीं है ॥ ३९ ॥ हृदयस्पर्शिनी जैसे आत्मा में कल्पितत्व नहीं, वैसे ही उसमें अवस्थान्तर भी नहीं—यह पूर्व श्लोक में बताया, किन्तु आत्मा का मोक्षावस्था को प्राप्त होना ही उसका अवस्थान्तर को प्राप्त होना स्पष्ट है। तब उससे अवस्थान्तर का अभाव कैसे माना जाय ? इस पर कहते हैं कि जिस वादी के मत में मोक्ष, आत्मा का अवस्थान्तर है, उसके मत के अनुसार मोक्ष अनित्य (कृतक) होने से उसे चल, विनाशी मानना होगा, तब वह मोक्ष ही नहीं कहलायेगा। उसे अपुरुषार्थ कहना पड़ेगा। मोक्ष को अवस्थान्तर जैसे नहीं माना जाता, उस तरह ब्रह्म के साथ आत्मा के संयोग को अथवा प्रकृति के वियोग को भी मोक्ष नहीं माना जा सकता ॥ ३९ ॥ संयोगस्याप्यनित्यत्वाद्वियोगस्य तथैव च। गमनागमने चैव स्वरूपं तु न हीयते ॥४०॥ संयोगस्येति—ब्रह्म के साथ संयोग और वियोग दोनों ही अनित्य होने के कारण उन्हें मोक्ष नहीं कहा जा सकता। उसी तरह दिव्य लोकों में जीव के गमनागमन को भी मोक्ष नहीं कह सकते, क्योंकि आत्मा अपने स्वरूप से कभी च्युत नहीं होता है, यानी आत्मस्वरूप में कभी च्युति नहीं हुआ करती ॥ ४० ॥ हृदयस्पर्शिनी ब्रह्मात्मसंयोग या प्रकृति से वियोग रूप मोक्ष के अनौचित्य में हेतु दे रहे हैं—'जो कृतक होता है, वह अनित्य होता है'—यह नियम है, तदनुसार संयोग या वियोग को मोक्ष नहीं माना जा सकता। उसी तरह जीव का संसार देश से परमात्मा के देश में गमन अथवा अपने उपासक भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये परमात्मा के उनके प्रति आगमन को ही मोक्ष यदि कहें, तो वह भी उचित न होगा। क्योंकि जीव और परमात्मा दोनों ही निर्विकार (विकाररहित) होने से उनका गमनागमन होना संभव नहीं। इस प्रकार दूसरों के मतों में दोष दिखलाकर अपना निर्दुष्ट मत बताते हैं—'स्वरूपं तु न हीयते'—आत्मस्वरूप में कभी च्युति नहीं हुआ करती। अतः 'आत्मस्वरूप ही मोक्ष है' एवञ्च हमारे पक्ष में मोक्ष नित्य है ॥ ४० ॥ स्वरूपस्यानिमित्तत्वात्तन्निमित्तं हि चापरे । अनुपात्तं स्वरूपं हि स्वेनात्यक्तं तथैव च ॥४१॥