उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in context१३४ उपदेशसाहस्री स्वरूपस्येति—स्वरूप का कोई कारण नहीं है, किन्तु अन्य [अवस्थान्तरादि] सकारण हैं। निष्कर्ष यह है कि 'स्वरूप' में अकार्यता है, किन्तु अन्य अवस्थान्तर आदि में कार्यता है, क्योंकि वे सकारण हैं। स्वरूप उसी को कहते है, जिसका ग्रहण [उपार्जन] अथवा त्याग किसी के द्वारा भी अर्थात् न अपने द्वारा और न किसी अन्य के द्वारा ही किया जा सकता है ॥ ४१ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मस्वरूपात्मक मोक्ष के नित्य और अकार्य होने में हेतु बता रहे हैं—स्वरूप अनिमित्त है, अर्थात् स्वरूप का कोई कारण नहीं है, इसलिये वह अकार्य है। अन्य अवस्थान्तर आदि सकारण हैं (सनिमित्त हैं) इसलिए वे अनित्य हैं अर्थात् कार्य हैं। स्वरूप की अनिमित्तता उसके लक्षण से ही सिद्ध होती है। स्वरूप उसे कहते हैं, जो अपने द्वारा या दूसरे के द्वारा उपार्जन नहीं किया जाता और न त्यागा ही जाता है। उपार्जन (उपादान) इसलिए नहीं किया जा सकता कि वह स्वरूपत्वेन नित्य है, और त्यागा इसलिये नहीं जा सकता कि वह स्वरूप होने के कारण ही त्यागने के योग्य नहीं है। तस्मात् अनिमित्त (निमित्तशून्य) होने से स्वरूप को नित्य ही कहना पड़ता है। लोकव्यवहार में भी देखा गया है कि वस्त्रादि का स्वरूप न उपादेय होता है और न हेय ही होता है। अतः वस्तुस्वरूप आगन्तुक नहीं है, अपितु नित्य है ॥ ४१ ॥ स्वरूपत्वान्न सर्वस्य त्यक्तुं शक्यो ह्यनन्यतः । ग्रहीतुं वा ततो नित्योऽविषयत्वापृथक्त्वतः ॥४२॥ स्वरूपत्वादिति—सबका स्वरूप सब से अभिन्न रहता है, अतः आत्मा का ग्रहण या त्याग नहीं हो सकता। तथा किसी का विषय न होने के कारण भी उसका पृथक् रूप से त्याग या ग्रहण करना संभव नहीं है ॥ ४२ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक से उक्त स्वरूपलक्षण को लक्ष्य (आत्मा) में संघटित कर रहे हैं—आकाशादि सबका स्वरूप होने से और आरोपित सर्प आदि के रज्जु की तरह आत्मभूत (अभिन्न) होने के कारण आत्मा का त्याग या ग्रहण करना संभव नहीं। अभिप्राय यह है कि अध्यस्त पदार्थ की सत्ता अपने अधिष्ठान से भिन्न नहीं होती, जिस प्रकार रज्जु में प्रतीयमान सर्प, रज्जु से भिन्न नहीं, उसी तरह सबका अधिष्ठानभूत आत्मा सबसे भिन्न नहीं, किन्तु अभिन्न ही है। तथा किसी का विषय न होने के कारण भी आत्मा पृथक् रूप से ग्राह्य या त्याज्य नहीं है। अविषय का उपादान या स्वरूप का त्याग नहीं किया जाता ॥ ४२ ॥ आत्मार्थत्वाच्च सर्वस्य नित्य आत्मैव केवलः । त्यजेत्तस्मात्क्रियाः सर्वाः साधनैः सह मोक्षवित् ॥४३॥ आत्मेति—सभी पदार्थ 'आत्मा' के ही लिये हैं। इसलिये 'आत्मा' ही नित्य और निरुपाधिक [केवल] है। अतः मुमुक्षु पुरुष साधनों के सहित समस्त कर्मों को त्याग दे ॥ ४३ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा की नित्यता में हेत्वन्तर दे रहे हैं—समस्त आगमापायी (उत्पाद-विनाशशील) पदार्थ (वस्तुएँ) आत्मा के लिए ही होती हैं। अर्थात् आत्मा की भोग्य होती हैं, अतः जो स्वयं अनागमापायी (उत्पत्तिरहित-विनाशरहित) और उनका भोक्ता होगा वही आत्मा है, वही नित्य है। वही केवल अर्थात् निरुपाधिक है। उपाधि से भी उसमें कोई विशेष नहीं हो पाता। जबकि आत्मा नित्य है, उसके अतिरिक्त सभी अनित्य हैं और आत्मार्थ हैं, तथा आत्मस्वरूप में स्थिति ही मोक्ष है, इतना स्पष्ट हो गया है। अतः मुमुक्षु को साधनों सहित समस्त कर्मों का त्याग कर देना चाहिए ॥ ४३ ॥
- त्वादपृथक् कृतः—पाठान्तरम् ।