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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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पार्थिवप्रकरणम् १३५ आत्मलाभः परो लाभ इति शास्त्रोपपत्तयः । अलाभोऽ*न्यात्मलाभस्तु त्यजेत्तस्मादनात्मताम् ।।४४।। आत्मलाभ इति—आत्मलाभ ही परमलाभ है, ऐसा शास्त्र का सिद्धान्त है तथा तर्कसंगत भी है। अन्य अनात्म पदार्थों का लाभ तो अलाभ ही है, यानी उसे 'लाभ' शब्द से कहना उचित नहीं है। इसलिये अनात्मता का त्याग करना चाहिये ।। ४४ ।। हृदयस्पर्शिनी मुमुक्षु को कर्म (क्रिया) का त्याग इसलिए भी करना चाहिए कि 'आत्मलाभान्न परं विद्यते'१—आत्मलाभ ही परमलाभ है—यह स्मृतिशास्त्र का सिद्धान्त है। इस प्रकार के अनेक शास्त्रवचन और उपपत्तियाँ हैं। 'सर्वस्व- त्यागेनापि आत्मसंरक्षणप्रवृत्तिदर्शनमुपपत्तिः'—सर्वस्व का त्याग करके भी आत्मरक्षण की प्रवृत्ति होती दिखाई देती है—यह उपपत्ति अर्थात् तर्क, युक्ति है। आत्मलाभ तो नित्यसिद्ध है, तब यह कौन-सी नवीन (अपूर्व) बात बताई जा- रही है ? नवीन बात यह कही जा रही है कि अन्यात्मलाभ जो है, वह वास्तव में अलाभ ही है। अर्थात् अपने आत्मा के अज्ञान से निष्पन्न अहंकारादि में अभेदेन जो आत्मस्फुरण होता है, उसे अन्यात्मलाभ कहते हैं। उससे संसारदुःख प्राप्त होता है, इस कारण वह वास्तविक लाभ नहीं है। और वह स्वतःसिद्ध परमानन्दाविर्भाव के होने में प्रतिबन्धक बनता है, उस कारण भी उसे वास्तविक लाभ नहीं कह सकते। वह अन्यात्मलाभ, लाभ न होकर प्रत्युत क्षतिरूप ही है। इसलिए प्रमाणजनित ब्रह्मात्मज्ञान से अज्ञातबाध द्वारा अहंकारादिकों में अविद्या से अध्यारोपित आत्माभिमा- नतारूप अनात्मताबुद्धि का त्याग करना चाहिए ।। ४४ ।। गुणानां साम्यभावस्य भ्रंशो न ह्युपपद्यते । अविद्यादेः प्रसुप्तत्वान्न चान्यो हेतुरुच्यते ॥४५॥ गुणानामिति—सृष्टि के सम्बन्ध में सांख्यदार्शनिकों के विचार का खण्डन कर रहे हैं—गुणों की साम्यावस्था का नाश [भ्रंश] होना संभव नहीं है, और वे सृष्टि के आरंभ से पूर्व अविद्या आदि अपने कारण में लीन रहते हैं, और उनसे भिन्न जो पुरुष है, उसे सृष्टि की उत्पत्ति का कारण नहीं माना गया है। अतः सृष्टि के सम्बन्ध में सांख्य के विचार उचित नहीं हैं ॥ ४५ ॥ हृदयस्पर्शिनी अभी तक यह बताया गया कि आत्मतत्त्व को ब्रह्मरूप समझना ही आत्मलाभ कर लेना है, और वही परमलाभ है, परमपुरुषार्थ है—इस प्रकार का ब्रह्मात्मैक्यज्ञान मोक्ष का साधन है। आत्मा अद्वयानन्दरूप है, उसमें संसार की जो प्रतीति होती है, वह अज्ञान के कारण होती है, वास्तविक प्रतीति नहीं है। इस प्रकार अपना मत बता- कर, उसी में मुमुक्षुओं की बुद्धि को स्थिर करने के लिये अन्यान्य मतों के निराकरण का आरंभ करते हुए भगवान् भाष्यकार सृष्टि के विषय में सांख्यपक्ष का निराकरण अब कर रहे हैं—सांख्य का कहना है कि स्वतन्त्र, अचेतन, त्रिगुणात्मक जो प्रधान (प्रकृति) है, वह पुरुष (आत्मा) के भोगापवर्गार्थ महदादि (महत्तत्त्व आदि) के रूप में परिणत होता है। किन्तु उनका यह कथन संभव नहीं हो सकता। क्योंकि गुणों की साम्यावस्था का नाम प्रकृति है। उस प्रकृति (सत्त्व-रजस्-तमोगुणों) के सृष्टिपूर्वकालीन मेलनरूप समभाव का (साम्यावस्था का) ध्वंस (भ्रंश, प्रच्युति) अर्थात् पूर्वावस्था (साम्यावस्था) का त्याग कर अवस्थान्तरापत्ति (वैषम्यावस्था) रूप परिणाम होना संभव नहीं है। यदि ऐसा माना जाय कि प्रकृति के सर्गोन्मुख होनेपर उसके गुणसाम्य में विषमता हो जाती है। किन्तु यह कहना ठीक न होगा, क्योंकि प्रश्न यह उपस्थित होगा कि गुणसाम्य में होनेवाला विषमतारूप परिणाम निर्हेतुक होगा या सहेतुक होगा ? यदि विषमतारूप परिणाम को निर्हेतुक अर्थात् बिना किसी कारण के ही माना जाय तो सर्वदा ही वह परिणाम होता रहेगा। और यदि अविद्या तथा अदृष्ट को उसका कारण कहें तो प्रकृति १. (आप. ध. १।२२।२)

  • ऽनात्म-पाठान्तरम् ।