BharatKosha
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

Page 162 of 364

Read in context
Page 162

१३६ उपदेशसाहस्री के परिणाम से पूर्व वे उसी में लीन रहते हैं, इसलिए वे उस परिणाम के कारण नहीं बन सकते। पुरुष को कारण कहें तो वह उदासीन है। ईश्वर को कारण कहें तो सांख्य सिद्धान्त का ही भंग होगा, क्योंकि वह जगत् के उपादानरूप में ईश्वर को नहीं बताता, जगत् का उपादान तो प्रकृति को बताता है। अतः प्रकृति का महदादिरूप में परिणाम होना संभव ही नहीं हो रहा है। अतः सांख्यमत अनुपपन्न है ॥ ४५ ॥ इतरेतरहेतुत्वे प्रवृत्तिः स्यात्सदा न वा। नियमो न प्रवृत्तीनां गुणेष्वात्मनि वा भवेत् ॥४६॥ इतरेति—परस्पर एक दूसरे की प्रवृत्ति में गुणों को कारण कहा जाय तो सर्वदा ही प्रवृत्ति होती रहेगी अथवा प्रवृत्ति ही नहीं होगी। क्योंकि आत्मा अथवा गुणों में उनकी प्रवृत्ति का नियामक बन पाने का कोई हेतु उपलब्ध नहीं हो रहा है ॥ ४६ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि सत्त्वादि गुणों को परस्पर एक दूसरे की प्रवृत्ति का कारण माना जाय तो किसी अन्य प्रयोजक (कारण) की प्रतीक्षा की अपेक्षा न रहने से सर्वदा ही प्रवृत्तिरूप परिणाम होता रहेगा, क्योंकि प्रवृत्ति का हेतु सर्वदैव विद्यमान है। या किसी विशेष के न होने से प्रवृत्ति ही नहीं होगी। अर्थात् आत्मा में या गुणों में उनकी प्रवृत्ति का नियामक कोई हेतु नहीं है। इसलिये सदा प्रवृत्ति या अप्रवृत्ति होगी—यह अभिप्राय है। सांख्य ने गुण और पुरुष के अतिरिक्त अन्य किसी तत्त्व को स्वीकार नहीं किया है, जो गुणों में या पुरुषों में स्थित रहकर प्रवृत्ति आदि का नियामक बन सके ॥ ४६ ॥ विशेषो मुक्तबद्धानां तादर्थ्यं न च युज्यते । अर्थार्थिनोस्त्वसम्बन्धो नार्थी ज्ञो नेतरोज्ञपि वा ॥४७॥ विशेष इति—यदि 'पुरुष' के भोगापवर्ग के लिये 'प्रधान' की प्रवृत्ति कहें तो बद्ध और मुक्त जीवों में कोई भेद ही नहीं हो सकेगा। इस सांख्यमत में 'अर्थार्थी' [शेष-शेषी] रूप सम्बन्ध ही नहीं बन सकता, क्योंकि 'जीव' भी अर्थी नहीं है, और 'प्रधान' भी अर्थी नहीं है ॥ ४७ ॥ हृदयस्पर्शिनी यथाकथञ्चित् प्रधान की प्रवृत्ति मानी भी जाय, तो भी दोष प्रसक्ति का परिहार नहीं हो सकेगा। प्रधान को पुरुषार्थ के लिये (पुरुष के भोग-मोक्ष के लिए) यदि स्वीकार करें तो बद्ध और मुक्त जीवों का भेद (विशेष) उपपन्न न हो सकेगा। क्योंकि एक ही प्रधान सभी पुरुषों के लिये समान होनेपर उस एक (प्रधान) के व्यापार से किसी का बन्ध और किसी का मोक्ष ऐसा विभिन्न परिणाम (विभिन्न व्यवस्था) उपपन्न नहीं हो सकता। तथाच सभी लोग सर्वदा बद्ध या मुक्त ही रहेंगे। इस मत में अर्थ-अर्थी (शेष-शेषी) का सम्बन्ध ही नहीं बन सकता। क्योंकि जो चाहा जाता है, उसे 'अर्थ' अर्थात् सुख या तत्साधनरूप पदार्थ (वस्तु) कहते हैं, और उसके चाहने वाले को 'अर्थी' कहते हैं। उनका उपकार्योपकारक—भावसम्बन्ध हुआ करता है। वह सम्बन्ध प्रधानवाद में (सांख्य के मत में) घटित (संगत) नहीं हो सकता। क्योंकि न तो 'जीव' ही अर्थी है और न प्रधान ही। क्योंकि जीव (पुरुष) ज्ञानैकस्वभाव (ज्ञ) है, अतः उसे अर्थी मानना उचित न होगा। उसे तो असंग और निर्विशेष माना गया है। उससे भिन्न जो प्रधान है, उसे भी अर्थी नहीं कह सकते, क्योंकि वह तो जड़ है। तस्मात् प्रधान में परार्थत्व की कल्पना करना अनुचित है। उस कारण अर्थ-अर्थी में शेष-शेषिसंबंध नहीं हो पा रहा है ॥ ४७ ॥ प्रधानस्य च पारार्थ्यं पुरुषस्याविकारतः । न युक्तं सांख्यशास्त्रेऽपि विकारेऽपि न युज्यते ॥४८॥

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित) · Page 162 of 364 · BharatKosha